मानो या ना मानोः द्रोणनगरी में निकली बेताल की बारात!

संतोष *सप्तांशु* देहरादूनः आप मानो या ना मानो लेकिन द्रोणनगरी में बेताल की बारात निकली और मैने देखी। आप सोच रहे होंगे कि कैसी मूर्खतापूर्ण बात हो रही है वह भी इस आधुनिकता की चकाचैंध में वह भी गूगल युग में। लेकिन आपको बता दूं कि यह सत्य है और यह सब मैंने खुद देखा है जीती जागती आंखों से। आपको विश्वास तो नहीं होगा, लेकिन मैं खुद इस उलझन मैं था कि आखिर क्या यह सत्य है! फिर मैं अंतिम निर्णय पर पहंुचा और मैरे दिल ने कहा कि यह हो सकता है। आप मानो या ना मानो लेकिन द्रोणनगरी में निकली है बेताल की बारात। चलिए आपको पूरी कहानी बताते हैं विस्तार से-

आपको बेताल की पूरी कहानी के बारे में भी बताउंगा विस्तार से। फिलहाल पहले आपको दून में निकली बेताल की बारात के बारे में बताता हूं। बात करीब छह माह पहले की है। मार्च माह के 22 तारीख अर्थात 23 मार्च 2 बजे के बाद की। मैं अपने आफिस से करीब दो बजे घर के लिए निकला। आफिस से मेरा कमरा लगभग दस मिनट की दूरी पर है। अपनी बाइक से मैं आफिस से निकला और पथरीबाग चैक पर पहुंचा। अमूमन पटेलनगर से कारगी चैक की सड़क पर रात को सन्नाटा ही रहता है। पथरीबाग चैक पर सड़क पर ब्रेकर होने के कारण मैंने बाइक की स्पीड कम की और चैराहे पर इधर-उधर इसलिए देखा कि कोई वाहन तो नहीं आ रहा और जैसे ही मैने सीधे देखा तो मैं चैक गया।


पाम सिटी वाली रोड पर सैकड़ों जुगनू चमक रहे थे और सफेद लिवाज में असंख्य परछाईया दिख रही थी। मैं चैक गया कि अभी तो मेरी नजर सीधी थी तो उस समय कुछ नहीं दिख फिर अकस्मात यह कैसा दृष्य! पहले लगा कि देररात तक आफिस में काम करने और काम के बोझ के कारण शायद यह दिख रहा। मैं आगे बढ़ा तो वह सफेद लिवाज की परछाईया अधिक दिखने लगी। उन परछाईयों के करीब 30 मीटर दूरी पर मैंने अपनी बाइक रोक ली और देखने लगा। उन परछाईयों की स्पीड बहुत तेज थी जिस कारण मुझे परछाईयां और जुगनू की दिख रहे थे। मैं इन्हे टकटकी लगाए देख रहा था कि करीब पांच मिनट के अंदर असंख्य परछाईयां हाथों में जुगनू लिए मानों तेजी से आगे बढ़ रही हो और धीरे-धीरे मुझसे दूर हो रही थी।


लगभग दस मिनट तक यह सब चला। कारगी की ओर से आती असंख्य सफेद परछाईयां हाथों में जुगनू लिए पाम सिटी वाले रास्ते पर सीधे आगे बढ़ गयी और धीरे-धीरे सीधी जाती हुई सड़क पर मैरी आंखों से ओझल हो गयी। यह दृष्य देख में सकपका सा गया था और मेरे आंखों की भोहें झपकने का नाम नहीं ले रही थी। जब वह सभी मेरी आंखों से ओझल हुई तो में अर्धचेतना से जागा। मेरी बाइक स्टार्ट ही थी। मन में डर बैठ गया था इस समयअंतराल में सड़क पर कोई वाहन तक नहीं आया। काफी देर रूकने के बाद हिम्मत की ओर आगे बढ़ा तो ऐसा लग रहा था कि बाइक में जैसे कोई भारी सामान पीछे रखा है। कुछ दूरी तक ऐसा ही चला और मैंने फिर बाइक रोक ली। उसके बाद पीछे देखा तो कोई नहीं था। तभी सामने से एक वाहन आता दिखा और मैं आगे बढ़ गया। इस बार बाइक स्मूथ ही चलने लगी। करीब तीन मिनट में ही मैं कमरे में पहुंच गया।

कमरे में पहुंचते ही डर लगने लगा। पहले तो बाथरूम में जाकर ठंडे पानी से नहाया और फिर चाय बनाकर चुस्किया लेने लगा। सुबह करीब आठ बजे तक नींद ही नहीं आयी। वही दृष्य आंखों के सामने आ रहा था। करीब आठ 15 पर नींद आयी और 11बजे मोबाइल की घंटी बजने पर खुली। उसके बाद भी उसी दृष्य पर मनन करने लगा। 23 मार्च शनिवार को करीब 12 बजे में उसी स्थान पर गया जहां देररात मैंन वह दृष्य देखा। आगे तक गया लेकिन कुछ भी निशान नहीं दिखे। अंतिम छोर पर हल्का बचा हुआ जंगल कुछ पेड़ दिखे और उन पेड़ों की जड़ों पर कुछ सूक्ष्म जीवों के घरोंदे दिखे लेकिन कुछ ऐसा नहीं दिखा कि जिससे मैं यह पुष्ट कर सकू कि देर रात मैंने जो देखा वह क्या था। फिर मैं वापस घर आया। अगले कुछ दिनों तक वह दृष्य मुझे परेशान कर रहा था। गूगल पर सर्च किया और अंधविश्वास से लेकर कई अपने मन के प्रश्नों का उत्तर जानना चाहा लेकिन आंखों देखी उस घटना को मैं कैसे उसका उत्तर मांगता यह समझ में नहीं आ रहा था।


बात पिछले मंगलबार की है। किसी काम के लिए नेहरू कालोनी गया था और देरसायं वापस लौटते समय रिस्पना बाईपास हाईवे पर बने नये फ्लाईओवर में कुछ देर के लिए रूका। सेल्फी ले रहा था तभी सेल्फी लेते काफी दूर से एक सन्यासी आते भी कैद हो गए। मैं रूक गया और उस सन्यासी ओगड़ बाबा का इंतजार करने लगा। बाबा जैसे ही नजदीक आये तो मैंने उन्हें पहचान लिया। हरिद्धार में उनके तपस्या स्थल घाट पर उनसे एक बार मुलाकात हुई थी। मैने जैसे ही बाबा को प्रणाम किया बाबा ने मुझे पहचान लिया और कहा कि मैं तूझे ही मिलने आ रहा था। मैं चैक गया कि बाबा के पास मेरा पता कहा से आया। मैंने अपनी जिज्ञासा बाबा के सामने रख दी। बाबा ने कहा कि सिगरेट,बीडी है जेब में तो मैंने सिगरेट निकाली। बाबा ने कहा जला। मैने अपने लिए और बाबा के लिए जला दी।


बाबा एक कश मारने के बाद बोले भक्त मैं तेरे बारे में हर बात जानता हू और मैं तूझसे मिलने जिस कारण से आ रहा था वह भी तूझे बता दूं। मैं हैरान हो गया और मेरी बैग में दो सेब थे बाबा ने लेते हुए कहा कि अब तेरे पर कोई संकट नहीं है और यह सेव मेरी दक्षिणा है। कहा कि अपने मन के प्रश्न को बता। मैं जानता था कि बाबा शमशान घाट पर तपस्या करने वाले और ज्ञानी है। मैं बाबा को करीब 94 के दशक से जानता हू जब बाबा से मेरी मुलाकात बाबा के केदारनाथ धाम जाते और आते समय हुई थी। बाबा से मैंने 22-23 मार्च देररात की घटना बतायी। बाबा ने का कि वह बेताल की बारात थी और उस बारात में एक आत्मा ने तुझे यह देखते देख लिया था। इसलिए उसने तूझ पर हमला करने की कोशिश की पर मैंने उसे भगा दिया था। उन्होंने रात की उस घटना के बारे में मुझे बताया तो मैं हैरान हो गया कि मेरे सिवाय वहा तो ओर कोई नही था फिर बाबा को कैसे पता चला।


मैने अपनी जिज्ञासा के लिए बाबा से पूछा कि आखिर यह सब मुझे क्यों दिखा। बाबा के उस उत्तर का मैं यहां जिक्र नहीं करूंगा बाबा ने इसके बाद मेरे सिर पर हाथ रखा और सेब खाते-खाते हरिद्धार जाने वाली रोडवेज की बस को हाथ देकर चले गए। मैं सोचता रह गया कि बाबा ने कुछ पैसे भी नहीं मांगे और मात्र दो सेब लेकर चले गए और कहा कि अब सब ठीक है। क्या बाबा मुझे आर्शीवाद देने या फिर मेरी रक्षा के लिए यहां तक आये। कुछ नहीं समझ पा रहा था। इस बात का किसी से जिक्र नहीं किया। सोमबार देरसाय कुछ सोच रहा था आफिस जाने का समय भी हो रहा था कि एक परममित्र का नागालैंड से करीब 15 साल बाद फोन आया तो बात करके मैं प्रसन्न हुआ। जब मित्र को पूछा कि कहा हो तो कहा कि मैं भारतीय सेना में हू आज गूगल पर तेरा नाम सर्च कर रहा था तो तेरी एक प्रोफाइल दिखी जिससे नंबर लिया। बातो-बातों में उससे इस घटना का जिक्र कर लिया। वह इसलिए कि करीब 15 साल पहले हमने ऐसी ही एक अनोखी घटना के दोनो साक्षी बने थे।


खैर कुछ बाते इस सप्ताह इतनी सुखद रही कि मैंने उन सभी को बेताल की बारात से जोड दिया। शायद यह मेरे मन का भ्रम है। लेकिन बाबा का आना और दोस्त का फोन कोई इस्तेफाक नहीं हो सकता। वैसे आपको बता दू कि अपने जीवन में ऐसे कई अनसुलझे पहलुओं पर पहले भी काम कर चुका हू। चाहे आप मुझे पागल कहे या फिर सनकी। मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता। आपको यह बता दू कि द्रोणनगरी में निकली बेताल की बारात को मैंने देखा है वह भी अपनी आंखों से। आप मानों या ना मानो लेकिन हमारे आसपास दूसरी दूनिया है और हम भी उसके कई बार साक्षी बनते हैं। उपरोक्त घटना कोई काल्पनिक नहीं है फिर भी आपको लगता है कि यह कल्पना है तो यह आप पर निर्भर करता है कि आप क्या सोच रहे हैं।

बारातियों ने सजने धजने की बजाय खुद पर भस्म को रमाया

भगवान शिव की बारात के बारे में माना जाता है कि इसमें भूत-प्रेत नाचते हुए पार्वतीजी के घर तक पहुंचे थे और बारातियों ने सजने धजने की बजाय खुद पर भस्म को रमाया हुआ था। आइए जानते हैं शिव विवाह और उनकी बारात से जुड़ा किस्सा। माना जाता है कि पवित्र सप्तऋषियों द्वारा विवाह की तिथि निश्चित कर दिये जाने के बाद भगवान शंकर जी ने अपने गणों को बारात की तैयारी करने का आदेश दिया। उनके इस आदेश से अत्यन्त प्रसन्न होकर गणेश्वर शंखकर्ण, कंकराक्ष, विकृत, विशाख, विकृतानन, दुन्दुभ, कपाल, कुण्डक, काकपादोदर, मधुपिंग, प्रसथ, वीरभद्र आदि गणों के अध्यक्ष अपने अपने गणों को साथ लेकर चल पड़े। नन्दी, क्षेत्रपाल, भैरव आदि गणराज भी कोटि कोटि गणों के साथ निकल पड़े। ये सभी तीन नेत्रों वाले थे। सबके मस्तक पर चंद्रमा और गले में नील चिह्न थे। सभी ने रुद्राक्ष के आभूषण पहन रखे थे। सभी के शरीर पर उत्तम भस्म पुती हुई थी। इन गणों के साथ शंकर जी के भूतों, प्रेतों, पिशाचों की सेना भी आकर सम्मिलित हो गयी। इनमें डाकिनी, शाकिनी, यातुधान, बेताल, बह्मराक्षस आदि भी शामिल थे।

इन सभी के रूप रंग, आकार प्रकार, वेष भूषा, हाव भाव आदि सभी कुछ अत्यन्त विचित्र थे। किसी का मुख नहीं था तो किसी के बहुत से मुख थे। कोई बिना हाथ पैर का था तो कोई बहुत से हाथ पैरों वाला था। किसी के बहुत सी आंखें थीं तो किसी के एक भी आंख नहीं थी। किसी का मुख गधे की तरह, किसी का स्यार की तरह तो किसी का मुख कुत्ते की तरह था। उन सभी ने अपने अंगों में ताजा खून चुपड़ रखा था। कोई अत्यन्त पवित्र तो कोई अत्यन्त वीभत्स तथा अपवित्र वेष धारण किये हुए था। उनके आभूषण बड़े ही डरावने थे। उन्होंने हाथ में नर कपाल ले रखा था। वे सब के सब अपनी तरंग में मस्त होकर नाचते गाते और मौज उड़ाते हुए महादेव शंकर जी के चारों ओर एकत्र हो गये।

चण्डीदेवी बड़ी प्रसन्नता के साथ उत्सव मनाती हुईं भगवान रुद्रदेव की बहन बनकर वहां आ पहुंचीं। उन्होंने सर्पों के आभूषण से स्वयं को विभूषित कर रखा था। वे प्रेत पर आरुढ़ होकर अपने मस्तक पर सोने का एक अत्यन्त चमकीला कलश धारण किये हुए थीं। धीरे धीरे वहां सारे देवता भी आकर एकत्र हो गये। उसे देवमण्डली के मध्यभाग में सबके अंतर्यामी भगवान श्रीविष्णु गरुड़ के आसन पर विराज रहे थे। पितामह ब्रह्माजी भी उनकी बगल में मूर्तिमान वेदों, शास्त्रों, पुराणों, आगमों, सनकादि महासिद्धों, प्रजापतियों, पुत्रों तथा अन्यान्य परिजनों के साथ उपस्थित थे। देवराज इंद्र भी नाना प्रकार के आभूषण धारण किये अपने विशाल ऐरावत गज पर आरुढ़ हो वहां पहुंच गये थे। सभी प्रमुख ऋषि भी वहां आ गये थे। तुम्बरु, नारद, हाहा और हूहू आदि श्रेष्ठ गंधर्व तथा किन्नरगण भी शिवजी की बारात की शोभा बढ़ाने के लिए वहां पहुंच गये थे। संपूर्ण जगन्माताएं, सारी देवकन्याएं, गायत्री, सावित्री, लक्ष्मी आदि सारी सिद्धिदात्री देवियां तथा सभी पवित्र देवकन्याएं भी वहां आ गयी थीं।

इन सबके वहां एकत्र हो जाने के उपरांत भगवान शंकर जी साक्षात् धर्म स्वरूप अपने स्फटिक के समान उज्ज्वल, सर्वांग सुंदर वृषभ पर सवार हुए। उस समय सारे देवताओं, सिद्धों, महर्षियों और भूतों, प्रेतों, यक्षों, किन्नरों, गंधर्वों से घिर हुए दूल्हावेश में भगवान शिवजी की अद्भुत शोभा हो रही थी। उस अति पवित्र, दिव्य और अत्यन्त विचित्र बारात के प्रयाण के समय डमरूओं की डम डम, भेरियों की गड़गड़ाहट और शंखों के गंभीर मंगलनाद, ऋषियों-महर्षियों के मंत्रोच्चार, यक्षों, किन्नरों, गंधर्वों के सरस गायन और देवांगनाओं के हर्ष विभोर नृत्य, कणन और रणन ध्वनि के मांगलिक निनाद से तीनों लोक परिव्याप्त हो उठे।

इस प्रकार भगवान शिवजी की वह पवित्र बारात हिमालय की ओर प्रस्थित हुई। महादेव की इस दिव्य बारात का स्मरण, ध्यान, वर्णन और श्रवण सभी प्रकार के लौकिक पारलौकिक उत्तम फलों को प्रदान करने वाला है।

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