हिमाचल में है एशिया का सबसे अमीर गांव !

शिमला। हिमाचल में है एशिया का सबसे अमीर गांव !जी हां यह सत्य है और यह सब किया है इस गांव के लोगों ने अपनी मेहनत से। आज के दौर में जहां लोग आधुनिकता की चकाचैंध में खोने को आतुर हैं वही इस गांव के लोग अपनी आजीविका के लिए आधुनिकता की चकाचैंध के साथ लगे हुए हैं। इस गांव के लोगों को यह ताज मिला है। आपको बता दें कि हिमांचल प्रदेश में लोग बागवानी से अपनी आजीविका चलाने के साथ-साथ देश-विदेश को अपने यहां के रसीले सेवों का रसास्वादन भी करवाते हैं। यही कारण है कि हिमाचलन के लोगों की कड़ी मेहनत से यह आज अमीर बने हुए हैं।

जिला शिमला के कोटखाई के क्यारी ने 20 साल तक एशिया में सबसे अमीर गांव होने का तमगा अपने पास रखा। इसे चुनौती शिमला जिले के ही चौपाल गांव के मड़ावग गांव के बागवानों ने दी। उन्होंने 20 साल की कड़ी मेहनत के बाद जीत हासिल कर ली। अब मड़ावग एशिया में सबसे अमीर गांव है। हालांकि ऐसा भी नहीं कि मड़ावग को यह दर्जा हमेशा के लिए मिला है। उसे बागी चिडग़ांव क्षेत्र से चुनौती मिल रही है।

बागी चिडग़ांव में सेब की पैदावार लगातार बढ़ रही है। बागवानों का दावा है कि आने वाले समय में बागी चिडग़ांव की सेब बेल्ट एशिया में कमाई में सबसे अव्वल होगी। बागी चिडग़ांव में सेब की पैदावार साल दर साल बढ़ रही है। बागवानों को उम्मीद है कि 10 साल में मड़ावग को पीछे छोड़ बागी चिडग़ांव एशिया में सबसे अमीर गांव बनेगा। मड़ावग गांव के बागवान सेब से सालाना 50 लाख रुपये से ज्यादा कमाई करते हैं।

गरोली मड़ावग पंचायत में सीजन के दौरान सेब की करीब छह लाख पेटियां मंडियों में भेजी जाती हैं। सेब की एक पेटी में 20 से 25 किलोग्राम सेब होता है। एक परिवार के हिस्से लाखों रुपये के सेब आते हैं। बागवान पंकज डोगरा ने बताया कि गरोली मड़ावग में छह गांव आते हैं। पूरे क्षेत्र से सेब की 10 लाख पेटियां बाजार में पहुंचती हैं। अकेले मड़ावग में सेब की छह लाख पेटियों का उत्पादन होता है।

वर्ष 1970 में मड़ावग से पहली बार बागवान मोती राम मेहता ने 10 हजार रुपये के सेब बेचे थे। उन्होंने वर्ष 1950 में सेब के पौधे लगाए थे। इन पौधों पर वर्ष 1965 में सैंपल आए। इसके पांच साल बाद पहली बार सेब की फसल बाजार में भेजी जा सकी। इससे पहले यहां के लोग 1500 से 2000 रुपये सालाना आलू या अन्य सब्जी की फसल बेचते थे।

बाजार में सेब के अच्छे दाम मिलने पर उन्होंने इसे स्वीकार किया। इसके बाद उन्होंने सेब के पौधे लगाए। मड़ावग गांव की तस्वीर वर्ष 1990 से बदलना शुरू हो गई थी। उस दौरान लोगों के बगीचों से फसल आना शुरू हो गई थी। इसके बाद मड़ावग में लोगों के घरों से लेकर उनके रहने-सहने का पूरा तरीका बदल गया।

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