दर्दनाक दास्तांः बिलखते मां-बाप, जंजीरों में बंधे बेटे !

पटनाः दर्दनाक दास्तांः बिलखते मां-बाप, जंजीरों में बंधे बेटे ! धर्म,शास़्त्रों के अनुसार हमें जिसने इस धरा पर भेजा और जो हमे संचालित कर रहा है वही हमे हमारे कर्मों के अनुसार सुख और दुःख भी देता है। इंसान के साथ अच्छा और बुरा दोनों ही कर्माें के फल को माना जाता है। यह सोचने वाली बात है कि क्या इस जन्म के कर्म और उनका फल हमे इसी जन्म में मिलता है या फिर इंसान के रूप में जन्म लेते समय हमें पूर्वजन्म के कर्माें का फल मिलता है। यह इसलिए लिख रहा हूं कि आज हम जिस सत्य घटना के बारे में लिख रहे हैं उसे आप क्या मानेंगे।

कहते हैं कि कुदरत के आगे इंसान बेवश हो जाता है। कारण कुछ भी हों, हम इस धरा में अगर जिंदा हैं तो कुदरत की वजह से और हमारी मौत भी होगी तो वह भी कुदरत की वजह से। फिर जन्म लेते समय ही हममे से कुछ लोगों को ऐसी व्याधि से क्यों गुजरना पड़ता है। क्या वास्तव में हमे संचालित करने वाला कोई ओर है या फिर हम खुद। चलिए जानते है पूरी कहानी-

आपको बता दें कि बिहार के रोहतास जिले के डेहरी शहर का एक मोहल्ला बारह पत्थर है। यहां एक घर के अहाते में चार युवक-किशोर जंजीरों से बंधे हुए हैं। सरफुद्दीन अंसारी और परवीन बीबी के ये बेटे मानसिक दिव्यांग हैं। इस दंपती के आठ औलाद हैं, जिनमें चार बच्चे चार साल की उम्र के बाद ही मानसिक बीमारी के शिकार होते गए।

पांचवें के लक्षण भी अब उन्हीं जैसे होते जा रहे हैं। सरफुद्दीन की मजदूरी से परिजनों का भरण-पोषण होता है और कमाई इतनी नहीं कि इलाज करा पाएं। इसलिए मानसिक और शारीरिक रूप से दिव्यांग अपने बेटों का बचपन जंजीरों में जकड़ दिया गया है। इन्हें रात-दिन जंजीरों में बांधकर ही रखा जाता है।

सरफुद्दीन अपना दुख सुनाते हैं। थोड़ा-सा मौका मिलते ही ये घर से भाग जाते और उपद्रव करने लगते थे। एक साथ चार-चार मानसिक दिव्यांगों को नियंत्रण में रखना इस मजदूर परिवार के वश की बात नहीं रह गई। थक-हार कर इन लोगों ने चारों भाइयों के पैरों में लोहे की बेड़ियां पहना दीं।

पिता सरफुद्दीन कहते हैं कि जन्म के समय उनके बच्चे स्वस्थ थे, लेकिन जब चार साल की उम्र हुई तो धीरे-धीरे मानसिक स्थिति बिगड़ गई। कहते हैं कि एक बच्चे को बीमारी हो तो किसी तरह इलाज भी करवा देते। एक साथ चार-चार बच्चे मानसिक रोग से ग्रसित हो गए, तो मुझ जैसे मेहनत-मजदूरी कर घर चलाने वाले के पास इनका इलाज कराना अब संभव नहीं है।

इन लोगों को किसी प्रकार की कोई सरकारी सुविधा अबतक नहीं मिल सकी। यहां तक कि दिव्यांगों को दिए जाने वाले पेंशन तक भी मयस्सर नहीं हो सका। अब आयुष्मान भारत का कार्ड आधार कार्ड से लिंक होने की प्रक्रिया में है। पहले मनोचिकित्सकों से इलाज भी कराया, लेकिन गरीबी में महंगे इलाज के चलते बेहतर उपचार नहीं करा सके।

मनोचिकित्सक डॉ उदय कुमार सिन्हा ने कहा कि पहले उन चारों को जंजीरों से मुक्त किया जाए। वे नि:शुल्क सलाह देने को तैयार हैं। उन्हें इलाज की जरूरत है। बिहार मेंटल हेल्थ एस्टेब्लिशमेंट एक्ट के अनुसार, राज्य में केवल कोइलवर मेंटल हॉस्पिटल और पीएमसीएच निबंधित हैं।

एक्ट के अनुसार, पुलिस को उन्हें अस्पताल में पहुंचाने का प्रबंध करने का प्रावधान किया गया है। वहीं, एसडीएम लाल ज्योतिनाथ शाहदेव का कहना है कि प्रशासनिक स्तर से जल्द ही चारों के इलाज की व्यवस्था कराने का प्रयास किया जाएगा। फिलहाल दिव्यांगों को दी जाने वाली पेंशन की शुरुआत करने की प्रक्रिया भी शुरू कर दी जाएगी।

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