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पीठा सिंह (पीठासीन) की डायरी

देहरादूनः यूं तो पीठा सिंह (पीठासीन अधिकारी) ने अपनी नौकरी में बहुत सारे चुनाव निपटाए थे लेकिन पंचायत चुनाव कराने का ये उसका पहला अनुभव था। यकीन मानिए पीठा सिंह की जितनी कुकरगत इस पंचायत चुनाव में हुई उतनी पूरे जीवन में कभी नहीं हुई। वैसे तो सामग्री वितरण केन्द्र में ही पीठा सिंह को आभास हो गया था कि अगले दो-तीन दिन तक उसकी रेल बनने वाली है लेकिन उससे ऐसा अंदाजा बिल्कुल नहीं था कि उसकी रेल इतनी बुरी तरह पंक्चर हो जाएगी

मतदान कराने के लिए जब उसे चार पदों (वार्ड मैंबर, ग्राम प्रधान, बी.डी.सी.(क्षेत्र पंचायत) और जिला पंचायत के मतपत्रों के साथ लोहे की जंक लगी और तेल से नहलाई हुई तीन भारी भरकम मतपेटियां थमाई गयी तो उसके होश उड़ गए। कहां तो ट्रेनिंग में उसे बताया गया था कि मतदान केंद्र में उसे असीमित शक्तियां प्राप्त हैं लेकिन यहां तो कुलीगिरी करने की नौबत आ गई थी।

उसने बड़ी हसरत से अपने तीन युवा पुरुष मतदान अधिकारियों की ओर देखा जो बहुत शानदार कपड़ों में चुनाव ड्यूटी पर आये थे, आते भी क्यों नहीं पहली बार चुनाव ड्यूटी जो लगी थी। तीनों ही अपनी पैंट की क्रीज ठीक करते हुए सबसे पहले बस में जाकर चढ गये। अब चौथी मतदान अधिकारी चूंकि महिला थी तो उससे उन बदसूरत मतपेटी उठाने की उम्मीद करता तो मुंगेरी लाल के सपने देखने जैसा था। खैर मरता क्या न करता, पीठा सिंह ने जैसे तैसे करके अकेले ही तीनों मतपेटियों बस में चढाई।

हांफती हुई प्राइवेट स्कूल की बस मतदान केंद्र की ओर सरकने लगी। जैसे-तैसे बस पोलिंग पार्टी को लेकर मतदान केंद्र के निकट पहुंची तो पता चला कि बूथ तक पहुंचने के लिए थोड़ा पदयात्रा भी करनी होगी। ये सोचकर ही पीठा सिंह को पसीना आने लगा कि तीन भारी-भरकम मतपेटियों को चुनाव सामग्री के साथ सुरक्षित मतदान स्थल तक कैसे पहुंचाया जाएगा?

खैर, साहब बस रूकी तो कंडक्टर ने दया दिखाते हुए तीनों मतपेटियों नीचे तो उतार दी लेकिन असली समस्या तो उन्हें मतदान केंद्र तक पहुंचाने की थी। इस बार पीठा सिंह की दयनीय दशा प्रथम और द्वितीय मतदान अधिकारियों से देखी नहीं गई और पैंट की क्रीज की परवाह छोड़कर उन्होंने भी एक एक मतपेटी उठा ली। बूथ पहुंचने तक पीठा सिंह की शकल ठीक वैसी ही हो चुकी थी जैसी खेतों के बीच में जंगली जानवरों को डराने के लिए बनाए गए पुतले (बिजूका) की होती है।

पोलिंग बूथ एक प्राथमिक पाठशाला में बनाया गया था लेकिन ‌वहां पर आजकल रामलीला का मंचन किया जा रहा था। पोलिंग पार्टी के साथ पुलिस वालों को देखकर उत्सुकतावश आस-पास मंडराते कुछ बच्चों ने बताया कि रामलीला में आज शाम को सीता माता का अपहरण किया जाएगा। उधर पंचायतों का अपहरण करने के लिए तैयार बैठे गांव के सभी सुयोग्य, सुशील,शिक्षित,कर्मठ,संघर्षशील, ईमानदार और बेरोजगार प्रत्याशी अपनी मुस्कुराती हुई तश्वीर के साथ बिजली के खंभों, छतों और पेड़ों पर लटके हुए थे।

चुनाव के तनाव में पीठा सिंह का चेहरा तो पहले से ही लटका हुआ था लेकिन चुनाव पूर्व तैयारियों की लिस्ट देखकर अब सभी मतदान अधिकारियों के चेहरे लटक गये थे। थोड़ी सी राहत तब महसूस हुई जब थोड़ी देर के लिए पोलिंग पार्टी में शामिल महिला मतदान अधिकारी अपने पति के साथ पोलिंग स्टेशन में प्रकट हुई हालांकि ये राहत उसी तरह की थी जिस तरह की राहत दंगा प्रभावित इलाकों में कर्फ्यू में कुछ देर की ढील के दौरान होती होगी।

इस चुनाव में भी उसे हमेशा की तरह इतने लिफाफे सीलबंद करके तैयार करने थे जितने कि आजकल डाकखाने में भी नहीं आते होंगे। हालांकि इन लिफाफों का कोई व्यावहारिक उपयोग नहीं था लेकिन लिफाफे तैयार करना और फिर उन्हें बड़ी इज्जत के साथ चुनाव आयोग को कोसते हुए सील करने की परंपरा चूंकि अंग्रेजों के जमाने से चल रही है तो यहां भी निभाई ही जानी थी।जब तक भारतीय लोकतंत्र के ऊपर अंग्रेजों की छाप रहेगी तब तक शायद चुनाव आयोग पीठा सिंह की पीठ पर सवार होकर इस वाहियात परंपरा को भी ढोता रहेगा।

यकीन मानिए इन लिफाफों में बहुत सारा कूड़ा जो फैंकने लायक होता है वो भी सीलबंद लिफाफे में चुनाव आयोग को वापस चाहिए होता है। हालांकि आज तक पीठा सिंह को ये पता नहीं चल पाया है कि उस कूड़े का चुनाव आयोग करता क्या है? वैसे तो नियमानुसार ये लिफाफे चुनाव के बाद तैयार किए जाने चाहिए लेकिन वास्तव में ये चुनाव से पहले ही तैयार कर दिए जाते हैं।

कुछ देर बाद महिला मतदान अधिकारी नौकरी पूरी करके अपने पति के साथ वापस लौटी तो पीठा सिंह को याद आया कि अभी तो उसे हजारों मतपत्रों के पीछे मुहर ठोककर हस्ताक्षर भी करने हैं। इस काम में कब रात के दो बज गए पता ही नहीं चला। सुबह सात बजे चुनाव एजेंट नियुक्ति करके मतपेटियों को सील करना था और आठ बजे से मतदान भी करवाना था इसलिए कुछ देर कमर सीधी करना भी जरूरी था।

खैर सुबह-सुबह सारी औपचारिकताएं पूरी करने के बाद मतदान की तैयारी पूरी हो चुकी थी। संभवतः महिला सशक्तिकरण और पुरुष मतदान अधिकारियों के साथ बराबरी की भूमिका निर्वहन के उद्देश्य से तैनात की गई तृतीय मतदान अधिकारी भी अपने पति के साथ सही समय पर मतदान शुरू होने से ठीक पहले मतदान केंद्र तक पहुंच गई थी। सभी मतदान अधिकारी अपनी कमीज़ पर “मतदान अधिकारी” लिखा हुआ बैच लगाकर मतदान के लिए तैयार हो चुके थे। पीठा सिंह ने भी अपनी कमीज़ कर “पीठासीन अधिकारी” लिखा हुआ बैच लिया और और शान से जाकर अपनी कुर्सी पर विराजमान हो गया।

इस बार चुनाव आयोग ने “आइसक्रीम” और “इमली” जैसे चुनाव चिन्ह भी बनाए हुए थे। कुछ पहाड़ी औरतें आपस में बतिया रही थी कि आइस”क्रीम” लगाने से जल्दी गोरे हो जाते हैं बल…… कुछ कह रहीं थीं कि आइस”क्रीम” लगाने से बुढ़ापे का असर नहीं होता है बल…… इसीलिए शहर की औरतें बुढ़ापे में भी जवान दिखती हैं बल…… गांव के कुछ बुजुर्ग आपस में बात कर रहे थे कि “इमली” पड़ोस के गांव में रहने वाली “खिमुलि” की सौतेली बहन है बल…… जितने मुंह उतनी बातें। अब पहाड़ के इन “बोटरों” ने न तो कभी साबूत इमली देखी और न कभी आइसक्रीम। इसी बीच एक बुजुर्ग महिला को चुनाव चिह्न “अनानास” पर मुहर ठोकनी थी लेकिन उसे पता नहीं था कि अनानास है किस चिड़िया का नाम? सो वह मतपत्र लेकर पीठा सिंह के पास आ गई और पूछने लगी कि –

“साहब इसमें “अननास” कहां पर है?”

तभी एक और मतदाता बैलेट पेपर दिखाकर पूछने लगा –

“खजूर का पेड़ कैसा होता है हजूर? इनमें से कौन सा होगा?”

इन‌ सवालों को सुनकर पीठा सिंह की हालत ऐसी हो गई जैसी यक्ष के प्रश्न सुनकर युधिष्ठिर की भी नहीं हुई होगी। जब तक पीठा सिंह एक समस्या का समाधान करता तब तक तीन और समस्यायें सामने तैयार खड़ी हो जाती। चूंकि पंचायत चुनाव का माहौल था तो “बेरोजगार” उम्मीदवारों ने भी अगले पांच साल के लिए रोजगार की उम्मीद में जमकर पैसा खर्च किया था। रात से जो “पार्टियों” का दौर शुरू हुआ था वो लगातार जारी था। प्रत्येक “जागरूक” मतदाता रात भर जागकर इन काकटेल पार्टियों में शामिल होकर लोकतंत्र को मजबूत करने की गंभीर कोशिश करता रहा।

कई मतदाताओं ने तो हर उम्मीदवार की पार्टी में शामिल होकर लोकतंत्र को मजबूत किया हालांकि लोकतंत्र की मजबूती का पहला चरण नामांकन पत्र दाखिल करने के साथ ही शुरू हो गया था परन्तु इसका समापन तो मतदान के समापन के बाद ही ही सकता था। लेकिन आज सुबह से ही लोकतंत्र की मजबूती चरम पर थी। अधिकतर लोग लोकतंत्र को मजबूत करने में खुद इतने कमजोर हो चुके थे कि लड़खड़ाते हुए बड़ी मुश्किल से अपने मताधिकार का प्रयोग कर पा रहे थे। कुछ को हाथ पकड़कर “बोट” डलवाना पड़ रहा था और पीठा सिंह अपना सिर पकड़कर ये सब देख रहा था।

मतदान प्रक्रिया बहुत धीरे धीरे चल रही थी क्योंकि हर मतदाता को चार वोट डालने थे। शाम चार बजे तक केवल पचास प्रतिशत मतदान हुआ था। कल रात से टिल्ल पड़े “बोटर” दिन भर मस्ती करने के बाद आखिरकार शाम को “बोट” डालने आने लगे थे। आखिर लोकतंत्र को मजबूत करने का उनका भी कर्त्तव्य था।

पांच बजे तक बूथ के बाहर तीन सौ “बोटर” लाइन में खड़े होकर अपने “बोट” के लिए तैयारी कर रहे थे। छह बजे तृतीय मतदान अधिकारी के पति महोदय उन्हें लेने के लिए बूथ पर पहुंच चुके थे और मजबूरी में पीठा सिंह को मुस्कुराते हुए उन्हें कार्यमुक्त करना पड़ा। गिरते-पडते रात के साढ़े नौ बजे तक पीठा सिंह ने बचे हुए तीन मतदान कार्मियों के साथ जैसे तैसे मतदान सम्पन्न कराया और मतपेटियों सील की।

जैसे ही पीठा सिंह ने मतदान बन्द किया वैसे ही एक हाथ में पर्ची और दूसरे हाथ में आधार कार्ड लेकर अन्तिम मतदाता प्रकट हुआ और “बोट” डालने की जिद करने लगा। पीठा सिंह ने उसका आधार कार्ड देखा तो उसमें नाम दर्ज था- “कुलवंत सिंह चड्ढा”


पीठा सिंह ने पूछा कि दिन में मतदान के लिए क्यों नहीं आये तो कुलवंत सिंह चड्ढा ने बताया कि कल रात से लगातार पार्टीबाजी के कारण दिन में नींद आ गई थी और अभी-अभी नींद खुली है। अगर उसने “बोट” नहीं डाला तो पार्टी देने वाले सभी प्रत्याशी उसे पीट-पीटकर अधमरा कर देंगे।

ऐसा कहते हुए कुलवंत सिंह चड्ढा के मुंह से जो सुगंध आ रही थी उससे पीठा सिंह के मुंह से भी लाल टपकने लगी थी।अब पीठा सिंह को समझ में आ गया था कि इस चुनाव में प्रत्याशी भी “कुलवंत सिंह चड्ढा” हैं और वोटर भी “कुलवंत सिंह चड्ढा” हैं और इस प्रकार दोनों मिलकर लोकतंत्र और पंचायतों को मजबूत करने में लगे हुए हैं।

तो मित्रो रात के साढ़े दस बजे जब पीठा सिंह अपनी पीठ में बैग और सिर पर मतपेटी लादकर अपने साथियों के साथ बस की ओर जा रहा था तो गांव के कुत्ते उसे चोर समझकर भौंकने लगे। पीठा सिंह की भौतिक अवस्था और पहली बार देखने के कारण शायद कुत्ते पीठा सिंह को चोर समझ बैठे थे।

धीरे धीरे कुत्तों के भौंकने की आवाजें बढ़ती गई और कुछ देर बाद ये कुत्ते पीठा सिंह को चारों ओर से घेरकर भौंकने लगे। पीठा सिंह को समझ में नहीं आ रहा था कि वो अपनी जान बचाये या फिर अपने सिर पर लादे हुए लोकतंत्र की रक्षा करे?

तो अंततः बहुत सारे अंतर्द्वद के बाद पीठा सिंह ने निर्णय लिया कि वो अपने कंधे पर लदे हुए लोकतंत्र को भी सुरक्षित रखेगा और अपनी जान भी बचायेगा। इसी कोशिश में वो पूरी ताकत से चिल्लाया –

“बचाओ…… बचाओ……
बचाओ…….बचाओ…..”

इतनी ज़ोर से बचाओ-बचाओ की आवाज सुनकर पीठा सिंह की पत्नी घबराकर दौड़ती हुई आई और पूछने लगी –

“सुबह-सुबह क्यों चिल्ला रहे हो? क्या हुआ? फिर कोई बुरा सपना देख लिया क्या?”

पसीने से लथपथ पीठा सिंह बोला –

“हां, वो सपने में पंचायत चुनाव की ड्यूटी करने गया था ना।”

पत्नी ने मुस्कुराते हुए याद दिलाया-

“अरे तुम भी ना,चलो उठो और तैयार हो जाओ। पंचायत चुनाव तो कल है आज तुम्हें चुनाव ड्यूटी के लिए जाना है।”

पीठा सिंह समझ नहीं पा रहा था कि वो रोये या हंसे?

डॉ डी एन भट्ट
हल्द्वानी (साभार सोशल मीडिया)

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