मसूरी: पहाड़ों की रानी मसूरी से करीब 15 किलोमीटर दूर स्थित दुधली की भद्राज पहाड़ी पर, श्रद्धा और आस्था का सैलाब उमड़ा. मौका भद्रराज मेले का था, जो भगवान बलराम को समर्पित है. यह केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि क्षेत्र की सांस्कृतिक विरासत और पौराणिक आस्था का जीवंत प्रमाण है. भारी बारिश के बीच सुबह की पहली किरण के साथ ही श्रद्धालुओं की भीड़ दुधली की ओर बढ़ चली थी. हरे-भरे जंगलों और बादलों की चादर ओढ़े रास्तों को पार करते हुए, हजारों लोग भद्रराज देवता के दर्शन के लिए मंदिर पहुंचे.
मंदिर प्रांगण में जैसे ही भगवान बलराम की आरती शुरू हुई, ढोल-नगाड़ों की आवाज़, शंखनाद और “जय भदराज देव” के उद्घोष से पूरी वादी गूंज उठी. यह मेला केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि स्थानीय लोगों की आस्था और लोक परंपराओं से जुड़ा अनमोल पर्व है. मान्यता है कि प्राचीन काल में जब जौनसार और पछुवादून के ग्रामीण, चौमासे के समय अपने मवेशियों को लेकर इस पहाड़ी क्षेत्र में आते थे, तो एक राक्षस उनके पशुओं को मार डालता था.
परेशान ग्रामीण भगवान बलराम की शरण में पहुंचे. बलराम ने राक्षस का वध किया. लंबे समय तक चरवाहों के साथ रहकर पशुओं की देखभाल की. तभी से ग्रामीणों ने इस स्थान पर मंदिर बनवाया. भद्रराज देवता के रूप में उनकी पूजा शुरू की. आज भी यह विश्वास कायम है कि भगवान बलभद्र अपने भक्तों और उनके पशुओं की रक्षा करते हैं.
एक अन्य पौराणिक मान्यता के अनुसार, द्वापर युग में भगवान बलराम इस क्षेत्र से ऋषि वेश में गुज़र रहे थे, जब यहां की गायों और पशुओं में एक गंभीर बीमारी फैल गई. ग्रामीणों ने उनसे मदद की गुहार लगाई. बलराम ने पशुओं को ठीक कर दिया. आशीर्वाद दिया कि कलयुग में वह यहीं भद्रराज देवता के रूप में वास करेंगे.
भद्रराज मंदिर समिति के अध्यक्ष राजेष नौटियाल ने बताया हर साल लगने वाला भद्राज मेला ना केवल धार्मिक अनुष्ठान हुए, बल्कि लोक संस्कृति की भी झलक देखने को मिली. स्थानीय कलाकारों ने जौनसारी लोकनृत्य, ढोल-दमाऊं की थाप पर सांस्कृतिक प्रस्तुतियां दीं.
बच्चों से लेकर बुज़ुर्गों तक, हर कोई इस उत्सव में झूमता नजर आया. मंदिर में श्रद्धालुओं ने दुग्धाभिषेक किया और बलराम जी से अपने परिवार की सुख-समृद्धि की कामना की.उन्होने कहा भद्राज मेला केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि एक ऐसा पर्व है जो उत्तराखंड की आत्मा से जुड़ा है. यह प्रकृति, परंपरा और पुराण का संगम है.