जहां युद्ध न हो वह है अयोध्या

उदय दिनमान डेस्कःअयोध्या को करोड़ों हिंदुओं के अराध्य भगवान श्री राम का जन्मस्थान माना जाता है। माना जाता है एक समय अयोध्या में भगवान राम का राज-पाट चलता था, लेकिन आज भगवान राम की मूर्ति तंबू में है। अपने ही राज्य में भगवान राम के रहने के लिए घर (मंदिर) नहीं है। प्राचीन काल में अयोध्या को कौशल देश भी कहा जाता था। अयोध्या हिंदुओं का प्राचीन और सात पवित्र तीर्थस्थलों में से एक है।

कहते है जतो नाम ततो गुणः। हमने यह सुना है और हमारे बडे़-बुर्जुग करते हैं कि जैसा जिसका नाम होता है उसमें वैसे गुण होते है और होने भी चाहिए। यहां बात अयोध्या की हो रही है तो आप सहज की अंदाजा लगा सकते हैं कि क्या कभी यहां युद्ध हुआ होगा। जिस स्थान पर विभिन्न धर्मांे के लोग एक साथ रह रहे हो वहां क्या सामप्रदायिक युद्ध नहीं हुआ होगा। लेकिन यह सत्य है अयोध्या में आज दिन तक सामप्रदायिक युद्ध नहीं हुआ।

अयोध्या के उत्तर प्रदेश राज्य का एक अति प्राचीन धार्मिक नगर है। यह पवित्र सरयू नदी के दाएं तट पर बसा है। इसे ‘कौशल देश’ भी कहा जाता था। अयोध्या हिन्दुओं का प्राचीन और पवित्र तीर्थस्थलों में एक है और जैन धर्म का शाश्वत तीर्थक्षेत्र है।

वेद में अयोध्या को ईश्वर का नगर बताया गया है, “अष्टचक्रा नवद्वारा देवानां पूरयोध्या” और इसकी संपन्नता की तुलना स्वर्ग से की गई है। रामायण के अनुसार अयोध्या की स्थापना मनु ने की थी। यह पुरी सरयू के तट पर बारह योजन चौड़ाई में बसी थी। अयोध्या मूल रूप से मंदिरों का शहर है। यहां आज भी हिन्दू, बौद्ध, इस्लाम एवं विशेषकर जैन धर्म से जुड़े अवशेष देखे जा सकते हैं।

जैन मत के अनुसार यहां चौबीस तीर्थंकरों में से पांच तीर्थंकरों का जन्म हुआ था। क्रम से पहले तीर्थंकर ऋषभनाथ जी, दूसरे तीर्थंकर अजितनाथ जी, चौथे तीर्थंकर अभिनंदननाथ जी, पांचवे तीर्थंकर सुमतिनाथ जी और चौदहवें तीर्थंकर अनंतनाथ जी। इसके अलावा जैन और वैदिक दोनों मतो के अनुसार भगवान रामचन्द्र जी का जन्म भी इसी भूमि पर हुआ। उक्त सभी तीर्थंकर और भगवान रामचंद्र जी सभी इक्ष्वाकु वंश से थे।

इसका महत्व इसके प्राचीन इतिहास में निहित है क्योंकि भारत के प्रसिद्ध एवं प्रतापी क्षत्रियों (सूर्यवंशी) की राजधानी यही नगर रहा है। उक्त क्षत्रियों में दाशरथी रामचन्द्र अवतार के रूप में पूजे जाते हैं। पहले यह कोसल जनपद की राजधानी था। प्राचीन उल्लेखों के अनुसार तब इसका क्षेत्रफल 96 वर्ग मील था। यहाँ पर सातवीं शाताब्दी में चीनी यात्री हेनत्सांग आया था। उसके अनुसार यहाँ 20 बौद्ध मंदिर थे तथा 3000 भिक्षु रहते थे।

इस प्राचीन नगर के अवशेष अब खंडहर के रूप में रह गए हैं जिसमें कहीं कहीं कुछ अच्छे मंदिर भी हैं। वर्तमान अयोघ्या के प्राचीन मंदिरों में सीतारसोई तथा हनुमानगढ़ी मुख्य हैं। कुछ मंदिर 18वीं तथा 19वीं शताब्दी में बने जिनमें कनकभवन, नागेश्वरनाथ तथा दर्शनसिंह मंदिर दर्शनीय हैं। कुछ जैन मंदिर भी हैं। यहाँ पर वर्ष में तीन मेले लगते हैं – मार्च-अप्रैल, जुलाई-अगस्त तथा अक्टूबर-नंवबर के महीनों में। इन अवसरों पर यहाँ लाखों यात्री आते हैं। अब यह एक तीर्थस्थान के रूप में ही रह गया है।

भगवान श्रीराम की लीला के अतिरिक्त अयोध्या में श्रीहरि के अन्य सात प्राकट्य हुये हैं जिन्हें सप्तहरि के नाम से जाना जाता है। अलग-अलग समय देवताअाें अाैर मुनियों की तपस्या से प्राकट्य हुये। इनके नाम भगवान गुप्तहरि , विष्णुहरि , चक्रहरि , पुण्यहरि , चन्द्रहरि , धर्महरि अाैर बिल्वहरि हैं।

शहर के पश्चिमी हिस्से में स्थित रामकोट अयोध्या में पूजा का प्रमुख स्थान है। यहां भारत और विदेश से आने वाले श्रद्धालुओं का साल भर आना जाना लगा रहता है। मार्च-अप्रैल में मनाया जाने वाला रामनवमी पर्व यहां बड़े जोश और धूमधाम से मनाया जाता है।

नगर के केन्द्र में स्थित इस मंदिर में 76 कदमों की चाल से पहुँचा जा सकता है। अयोध्या को भगवान राम की नगरी कहा जाता है। मान्यता है कि यहां हनुमान जी सदैव वास करते हैं। इसलिए अयोध्या आकर भगवान राम के दर्शन से पहले भक्त हनुमान जी के दर्शन करते हैं।

यहां का सबसे प्रमुख हनुमान मंदिर “हनुमानगढ़ी” के नाम से प्रसिद्ध है। यह मंदिर राजद्वार के सामने ऊंचे टीले पर स्थित है। कहा जाता है कि हनुमान जी यहाँ एक गुफा में रहते थे और रामजन्मभूमि और रामकोट की रक्षा करते थे। हनुमान जी को रहने के लिए यही स्थान दिया गया था।

प्रभु श्रीराम ने हनुमान जी को ये अधिकार दिया था कि जो भी भक्त मेरे दर्शनों के लिए अयोध्या आएगा उसे पहले तुम्हारा दर्शन पूजन करना होगा। यहां आज भी छोटी दीपावली के दिन आधी रात को संकटमोचन का जन्म दिवस मनाया जाता है। पवित्र नगरी अयोध्या में सरयू नदी में पाप धोने से पहले लोगों को भगवान हनुमान से आज्ञा लेनी होती है।

यह मंदिर अयोध्या में एक टीले पर स्थित होने के कारण मंदिर तक पहुंचने के लिए लगभग 76 सीढि़यां चढ़नी पड़ती हैं। इसके बाद पवनपुत्र हनुमान की 6 इंच की प्रतिमा के दर्शन होते हैं,जो हमेशा फूल-मालाओं से सुशोभित रहती है। मुख्य मंदिर में बाल हनुमान के साथ अंजनी माता की प्रतिमा है।

श्रद्धालुओं का मानना है कि इस मंदिर में आने से उनकी सारी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। मंदिर परिसर में मां अंजनी व बाल हनुमान की मूर्ति है जिसमें हनुमान जी, अपनी मां अंजनी की गोद में बालक के रूप में विराजमान हैं।

इस मन्दिर के निर्माण के पीछे की एक कथा प्रचलित है। सुल्तान मंसूर अली अवध का नवाब था। एक बार उसका एकमात्र पुत्र गंभीर रूप से बीमार पड़ गया। प्राण बचने के आसार नहीं रहे, रात्रि की कालिमा गहराने के साथ ही उसकी नाड़ी उखड़ने लगी तो सुल्तान ने थक हार कर संकटमोचक हनुमान जी के चरणों में माथा रख दिया।

हनुमान ने अपने आराध्य प्रभु श्रीराम का ध्यान किया और सुल्तान के पुत्र की धड़कनें पुनः प्रारम्भ हो गई। अपने इकलौते पुत्र के प्राणों की रक्षा होने पर अवध के नवाब मंसूर अली ने बजरंगबली के चरणों में माथा टेक दिया। जिसके बाद नवाब ने न केवल हनुमान गढ़ी मंदिर का जीर्णोंद्धार कराया बल्कि ताम्रपत्र पर लिखकर ये घोषणा की कि कभी भी इस मंदिर पर किसी राजा या शासक का कोई अधिकार नहीं रहेगा और न ही यहां के चढ़ावे से कोई कर वसूल किया जाएगा। उसने 52 बीघा भूमि हनुमान गढ़ी व इमली वन के लिए उपलब्ध करवाई।


इस हनुमान मंदिर के निर्माण के कोई स्पष्ट साक्ष्य तो नहीं मिलते हैं लेकिन कहते हैं कि अयोध्या न जाने कितनी बार बसी और उजड़ी, लेकिन फिर भी एक स्थान जो हमेशा अपने मूल रूप में रहा वो हनुमान टीला है जो आज हनुमान गढ़ी के नाम से प्रसिद्ध है। लंका से विजय के प्रतीक रूप में लाए गए निशान भी इसी मंदिर में रखे गए जो आज भी खास मौके पर बाहर निकाले जाते हैं और जगह-जगह पर उनकी पूजा-अर्चना की जाती है।

मन्दिर में विराजमान हनुमान जी को वर्तमान अयोध्या का राजा माना जाता है। कहते हैं कि हनुमान यहाँ एक गुफा में रहते थे और रामजन्मभूमि और रामकोट की रक्षा करते थे। मुख्य मंदिर में बाल हनुमान के साथ अंजनि की प्रतिमा है। श्रद्धालुओं का मानना है कि इस मंदिर में आने से उनकी सारी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।

ये मन्दिर अयोध्या नगर के केन्द्र में स्थित बहुत ही प्राचीन भगवान श्री रामजी का स्थान है जिस्को हम (राघवजी का मंदिर) नाम से भी जानते है मन्दिर में स्थित भगवान राघवजी अकेले ही विराजमान है ये मात्र एक ऐसा मंदिर है जिसमे भगवन जी के साथ माता सीताजी की मूर्ती बिराजमान नहीं है सरयू जी में स्नान करने के बाद राघव जी के दर्शन किये जाते है

कहा जाता है कि नागेश्वर नाथ मंदिर को भगवान राम के पुत्र कुश ने बनवाया था। माना जाता है जब कुश सरयू नदी में नहा रहे थे तो उनका बाजूबंद खो गया था। बाजूबंद एक नाग कन्या को मिला जिसे कुश से प्रेम हो गया। वह शिवभक्त थी। कुश ने उसके लिए यह मंदिर बनवाया। कहा जाता है कि यही एकमात्र मंदिर है जो विक्रमादित्य के काल के पहले से है। शिवरात्रि पर्व यहां बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है।

हनुमान गढ़ी के निकट स्थित कनक भवन अयोध्या का एक महत्वपूर्ण मंदिर है। यह मंदिर सीता और राम के सोने मुकुट पहने प्रतिमाओं के लिए लोकप्रिय है। इसी कारण बहुत बार इस मंदिर को सोने का घर भी कहा जाता है। यह मंदिर टीकमगढ़ की रानी ने 1891 में बनवाया था। इस मन्दिर के श्री विग्रह (श्री सीताराम जी) भारत के सुन्दरतम स्वरूप कहे जा सकते है। यहाँ नित्य दर्शन के अलावा सभी समैया-उत्सव भव्यता के साथ मनाये जाते हैं।

महान संत स्वामी श्री युगलानन्यशरण जी महाराज की तपस्थली यह स्थान देश भर में रसिकोपासना के आचार्यपीठ के रूप में प्रसिद्ध है। श्री स्वामी जी चिरान्द (छपरा) निवासी स्वामी श्री युगलप्रिया शरण ‘जीवाराम’ जी महाराज के शिष्य थे। ईस्वी सन् १८१८ में ईशराम पुर (नालन्दा) में जन्मे स्वामी युगलानन्यशरण जी का रामानन्दीय वैष्णव-समाज में विशिष्ट स्थान है।

आपने उच्चतर साधनात्मक जीवन जीने के साथ ही आपने ‘रघुवर गुण दर्पण’,’पारस-भाग’,’श्री सीतारामनामप्रताप-प्रकाश’ तथा ‘इश्क-कान्ति’ आदि लगभग सौ ग्रन्थों की रचना की है। श्री लक्ष्मण किला आपकी तपस्या से अभिभूत रीवां राज्य (म.प्र.) द्वारा निर्मित कराया गया। ५२ बीघे में विस्तृत आश्रम की भूमि आपको ब्रिटिश काल में शासन से दान-स्वरूप मिली थी।

श्री सरयू के तट पर स्थित यह आश्रम श्री सीताराम जी आराधना के साथ संत-गो-ब्राह्मण सेवा संचालित करता है। श्री राम नवमी, सावन झूला, तथा श्रीराम विवाह महोत्सव यहाँ बड़ी भव्यता के साथ मनाये जाते हैं। यह स्थान तीर्थ-यात्रियों के ठहरने का उत्तम विकल्प है। सरयू की धार से सटा होने के कारण यहाँ सूर्यास्त दर्शन आकर्षण का केंद्र होता है।

हिन्दुओं के मंदिरों के अलावा अयोध्या जैन मंदिरों के लिए भी खासा लोकप्रिय है। जैन धर्म के अनेक अनुयायी नियमित रूप से अयोध्या आते रहते हैं। अयोध्या को पांच जैन र्तीथकरों की जन्मभूमि भी कहा जाता है। जहां जिस र्तीथकर का जन्म हुआ था, वहीं उस र्तीथकर का मंदिर बना हुआ है। इन मंदिरों को फैजाबाद के नवाब के खजांची केसरी सिंह ने बनवाया था।

प्रभु श्रीराम की नगरी होने से अयोध्या उच्चकोटि के सन्तों की भी साधना-भूमि रही। यहाँ के अनेक प्रतिष्टित अाश्रम एेसे ही सन्तों ने बनाये। इन सन्तों में स्वामी श्रीरामचरण दास जी महाराज ‘करुणासिन्धु जी’ स्वामी श्रीरामप्रसादाचार्य जी , स्वामी श्री युगलानन्य शरण जी] , स्वामी श्रीमणिराम दास जी , स्वामी श्रीरघुनाथ दास जी , पं.श्री जानकीवर शरण जी , पं. श्री उमापति त्रिपाठी जी अादि अनेक नाम उल्लेखनीय हैं।

अब तक अयोध्या क्यों नहीं गए नरेंद्र मोदी?
“मोदी जी बनारस से लेकर मगहर तक चले गए. दुनिया भर में घूम-घूम कर मंदिर, मस्जिद और मज़ार पर जा रहे हैं लेकिन अयोध्या से पता नहीं क्या बेरुख़ी है उन्हें?”अयोध्या में चाय की दुकान पर अख़बार पढ़ रहे संन्यासी वेश में एक सज्जन ने बातचीत के दौरान बड़ी निराशा और शिकायत के साथ ये बात कही.

वहीं, इनसे मुलाक़ात हुई और बातें शुरू हो गईं. हमने नाम जानना चाहा तो बोले, “साधु का कोई नाम नहीं होता. बस यही दंड और गेरुआ रंग ही उसकी पहचान होती है. नाम पहले जो था, अब उससे हमारी पहचान नहीं है.”ख़ैर, उनका नाम पहले क्या था और अब क्या है, इसमें हमारी बहुत दिलचस्पी भी नहीं थी, इसलिए दोबारा बताने का आग्रह नहीं किया.लेकिन, एक साधु के रूप में जो पीड़ा उन्होंने व्यक्त की, उसका समर्थन दुकान पर मौजूद अयोध्या के कुछ स्थानीय लोग भी करते मिले.

दिनेश कहने लगे, “यहां आकर बताएंगे क्या? केंद्र में चार साल सरकार में बिता दिए, डेढ़ साल राज्य में भी सरकार बनाए हो रहे हैं, हर जगह बहुमत है, अब कोई बहाना नहीं है, फिर भी मंदिर निर्माण के लिए कोर्ट का बहाना बना रहे हैं.”दरअसल, अयोध्या और भारतीय जनता पार्टी का राजनीतिक संबंध भावनात्मक रूप से जुड़ा हुआ है.उत्तर प्रदेश ही नहीं बल्कि देश भर में भारतीय जनता पार्टी को राजनीतिक पहचान दिलाने में अयोध्या और राम मंदिर की कितनी भूमिका रही है, यह किसी से छिपा नहीं है.

यही नहीं, 1991 में उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी की जब पहली बार कल्याण सिंह के नेतृत्व में सरकार बनी थी तो पूरा मंत्रिमंडल शपथ लेने के तत्काल बाद अयोध्या में रामलला के दर्शन के लिए आया था.इतना ही नहीं, पिछले साल उत्तर प्रदेश में जब से योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में सरकार बनी है तब से अयोध्या के विकास के लिए न सिर्फ़ तमाम घोषणाएं की गईं बल्कि दीपावली के मौक़े पर भव्य कार्यक्रम और दीपोत्सव का आयोजन भी किया गया.

ऐसे में पहली बार केंद्र में बीजेपी की पूर्ण बहुमत की सरकार बनवाने वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का बतौर प्रधानमंत्री चार साल से ज़्यादा समय बिताने के बावजूद अयोध्या न आना, चौंकाता ज़रूर है.बीजेपी नेता इस बारे में बात करने से थोड़ा परहेज़ करते हैं लेकिन अयोध्या से बीजेपी सांसद लल्लू सिंह इसे सिर्फ़ इत्तेफ़ाक बताकर सवाल को टाल जाते हैं.लल्लू सिंह कहते हैं, “ये सही है कि प्रधानमंत्री बनने के बाद मोदी जी अयोध्या नहीं आए. चुनाव के समय भी उन्होंने फ़ैज़ाबाद में रैली को संबोधित किया था. लेकिन इसका कोई ख़ास मतलब नहीं है कि वह यहां क्यों नहीं आए. व्यस्त कार्यक्रम रहता है उनका, समय नहीं मिला होगा. लेकिन आएंगे ज़रूर.”

प्रधानमंत्री का समय काफी व्यस्त होता है, इस बात से इनकार तो नहीं किया जा सकता.लेकिन, ये सवाल तब और मौजूं हो जाता है जब प्रधानमंत्री वाराणसी से ही सांसद हों, वाराणसी की बार-बार यात्रा करते हों, अन्य शहरों में भी जाते हों, कबीर की समाधि स्थली मगहर तक चले गए हों, लेकिन अयोध्या आने का समय न निकाल पाए हों.

दरअसल, नरेंद्र मोदी न सिर्फ़ प्रधानमंत्री रहते कभी अयोध्या आए और न ही 2014 के लोकसभा चुनाव के दौरान उन्होंने अयोध्या यात्रा की.यहां तक कि एक बार चुनावी रैली प्रस्तावित भी हुई थी लेकिन बाद में वो किन्हीं कारणों से रद्द कर दी गई. लोकसभा चुनाव के दौरान फ़ैज़ाबाद और आंबेडकरनगर की रैलियों में वो ज़रूर गए थे.

यही नहीं, लोकसभा चुनाव के दौरान और पिछले साल हुए विधान सभा चुनाव के दौरान उत्तर प्रदेश में हुई दर्जनों जनसभाओं में भी उन्होंने कहीं भी अयोध्या या राम मंदिर का कोई ज़िक्र नहीं किया.लोकसभा चुनाव के दौरान तो एक जनसभा में उन्होंने ये कहकर एक तरह से राम मंदिर को पार्टी की प्राथमिकताओं से ही लगभग ख़ारिज कर दिया कि ‘पहले शौचालय, फिर देवालय.’

हालांकि इस बीच उन्होंने पिछले दिनों हुए गुजरात विधानसभा चुनाव के दौरान राम मंदिर का ज़िक्र ज़रूर किया था.एक चुनावी जनसभा में उन्होंने कहा कि कांग्रेस के नेता कपिल सिब्बल अयोध्या में राम मंदिर मामले की सुनवाई को अगले चुनाव तक टालने की सुप्रीम कोर्ट से क्यों मांग कर रहे हैं.लखनऊ में वरिष्ठ पत्रकार योगेश मिश्र कहते हैं कि नरेंद्र मोदी 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले ज़रूर अयोध्या जाएंगे.उनके मुताबिक, “नरेंद्र मोदी अयोध्या एक विजेता के रूप में जाना चाहते हैं. पूरी उम्मीद है कि सुप्रीम कोर्ट से राम जन्म भूमि और विवादित ढांचे का कोई न कोई फ़ैसला ज़रूर आ जाएगा.”

“यदि हाई कोर्ट के फ़ैसले के आधार पर ही सुप्रीम कोर्ट का भी फ़ैसला आता है तो ज़ाहिर है ये हिंदुओं के पक्ष में होगा क्योंकि हाई कोर्ट भी दो तिहाई ज़मीन हिंदू पक्ष को सौंप ही चुका है.””ऐसा फ़ैसला आने के बाद यदि नरेंद्र मोदी अयोध्या जाते हैं तो ज़ाहिर है, फ़ैसला भले ही कोर्ट का हो, क्रेडिट मोदी जी लेने की पूरी कोशिश करेंगे.”

लेकिन अयोध्या की इस कथित उपेक्षा की चर्चा क्या बीजेपी नेताओं, आरएसएस के आनुषंगिक संगठनों, आस्थावान हिंदुओं के बीच नहीं होती होगी, जो बीजेपी को एक तरह से ‘राम मंदिर समर्थक पार्टी’ के तौर पर देखते हैं?योगेश मिश्र कहते हैं, “नरेंद्र मोदी कट्टर हिंदुओं को अपने हिंदू हृदय सम्राट होने का प्रमाण पत्र गुजरात में दे चुके हैं.”

“यही कारण है कि अयोध्या की चर्चा कभी ख़ुद न करने और देवालय से पहले शौचालय बनाने की बात करने के बावजूद हिंदुओं का ये वर्ग उनके ख़िलाफ़ आक्रामक नहीं हो पाया. उसे पता है कि ये सब चुनावी सभाओं की विवशता हो सकती है लेकिन मोदी जी हिंदुओं के हितैषी हैं, इसमें वो संदेह की गुंज़ाइश फ़िलहाल नहीं देखता.”

योगेश मिश्र कहते हैं कि नरेंद्र मोदी ख़ुद भले ही अयोध्या न आएं या अयोध्या की चर्चा न करें, लेकिन ऐसा नहीं है कि ये उनके एजेंडे में नहीं है. योगेश मिश्र के मुताबिक, “बीजेपी के तमाम नेता जो अपनी आक्रामक शैली में अयोध्या या राम मंदिर की चर्चा करते हैं, तो आपको क्या लगता है कि ये बिना उनकी मौन स्वीकृति के हो रहा है?”

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