मंगसीर की बग्वाल: ढोल-दमाऊं पर झूमे ग्रामीण

मसूरी: मंगसीर की बग्वाल का मुख्य पर्व पकोड़िया संपूर्ण यमुना, अगलाड़ और टोंस घाटी में धूमधाम से मनाया गया। ढोल, दमाऊ, रणसिंगा आदि वाद्ययंत्रों की धुन पर पारंपरिक परिधान में सजी महिलाओं और पुरुषों का रासौ-तांदी नृत्य आकर्षण का केंद्र रहा। इसके बाद भीमल की लकड़ी से तैयार भैलो खेले गए।

तीन दिवसीय मंगसीर की बग्वाल का उत्सव असक्या पर्व के साथ शुरू हो गया था। पहले दिन घरों में झंगोरे के पकवान बनाए गए। इसके साथ ही मुख्य पर्व की तैयारी भी शुरू कर दी गई थी। मुख्य पर्व पर सुबह घरों में उड़द की दाल के पकोड़ों के साथ संवाड़े बनाए गए, जिन्हें मेहमानों और स्वजन को परोसा गया। दोपहर बाद पुरुष भीमल की लकड़ियों से भैलो बनाने में जुट गए।

रात में बच्चों से लेकर बुजुर्ग तक पारंपरिक परिधान में होलियात के लिए मंडाण चौक पर एकत्र हुए। यहां नृत्य और गीत-संगीत के बीच साठी से बने चूड़ा, पकोड़ों और संवाड़ों से डिबसा पूजन किया गया। इसके बाद भैलो जलाकर खेले गए। तत्पश्चात पारंपरिक लोकनृत्य और लोकगीतों का दौर शुरू हुआ, जो देर रात तक जारी रहा।

आज गुरुवार को तीसरे दिन मंगसीर की बग्वाल का तीसरा पर्व भिरूड़ी बराज मनाया जाएगा। इस अवसर पर कुछ गांवों में आज शाम को भांड खींची जाएगी, जबकि कुछ गांवों में 25 नवंबर को और 26 नवंबर को पारंपरिक पांडव नृत्य मंडाण का आयोजन होगा।

विशेषज्ञों की मानें तो वर्ष 1632 में तिब्बत के दावा घाट में गढ़वाल और तिब्बत की सेना के बीच युद्ध हुआ था। सेनापति लोदी रिखोला और माधो सिंह भंडारी के नेतृत्व में गढ़वाल की सेना युद्ध के लिए गई थी। युद्ध लंबा चलने पर सेना दीपावली तक घर नहीं लौट पाई। तब सेनापति माधो सिंह भंडारी ने संदेश भिजवाया कि तिब्बत पर विजय हासिल कर लौटने के बाद ही

बग्वाल यानी दीपावली मनाई जाएगी। गढ़वाल की सेना दीपावली के ठीक एक माह बाद तिब्बत पर विजय हासिल कर लौटी थी। तभी से कार्तिक माह में मंगसीर की बग्वाल मनाने की परंपरा चली आ रही है।

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