कोरोना वायरस हड्डियों को भी कर रहा खराब

नई दिल्लीः कोरोना से रिकवर हो चुके लोगों को कई प्रकार की समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है. इनमें सांस लेने में परेशानी, कमजोरी और हार्ट डिजीज के काफी केस देखे जा रहे हैं. कोविड के इलाज के दौरान स्टेरॉयड लेने की वजह से ब्लैक फंगस जैसी खतरानाक बीमारी फैली थी, जिससे आंखों खराब हो रही है.

अब शरीर की हड्डियों पर भी इन स्टेरॉयड का असर देखा जा रहा है. कोविड से संक्रमित हो चुके लोगों को हड्डियों की बीमारी भी हो रही है.जिसे एवैस्कुलर नेक्रोसिस कहा जाता है.ये हड्डियों की एक खतरनाक बीमारी है, जिसमें हड्डियां गलने लगती हैं. इसलिए इसे डेथ ऑफ बोन भी कहा जाता है.

कोरोना के इलाज के दौरान जिनको अधिक मात्रा में स्टेरॉयड दिए गए थे उन लोगों को यह बीमारी हो रही है. इसमें हड्डियां पूरी तरह खत्म हो जाती है. ये बीमारी कूल्हे की हड्डियों में हो रही है. कोविड की दूसरी लहर के दौरान बड़ी संख्या में मरीज अस्पताल में भर्ती हुए थे.

तब लोगों के इलाज के लिए उन्हें स्टेरॉयड वाली दवाएं दी गई थी. उसके परिणाम अब सामने आ रहे हैं. कोविड के दौरान जो मरीज अस्पताल में भर्ती हुए थे. उनको एवैस्कुलर नेक्रोसिस की बीमारी हो रही है.

इसमें हिप बोन में खून का सर्कुलेशन सही से नहीं हो पाता है. इस वजह से हड्डियों के टिश्यू डेड होने लगते हैं. ये बीमारी हड्डियों को खत्म कर देती है. शुरुआत में इस समस्या के लक्षण पता भी नहीं चलते हैं और ये धीरे धीरे कूल्हे की हड्डियों को खराब करने लगती है.

नई दिल्ली के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान ( एम्स) के ट्रामा सेंटर चीफ डॉ. राजेश मल्होत्रा का कहना है कि कोविड के बाद एवैस्कुलर नेक्रोसिस के मामले काफी बढ़ गए हैं. एम्स में ही इस बीमारी के करीब 150 केस सामने आए हैं. इनमें से 15 मरीजों की हिप रिप्लेंटमेंट सर्जरी करनी पड़ी है.

डॉक्टरों का कहना है कि कोविड से पहले इस बीमारी के केस काफी कम आते थे, लेकिन महामारी के बाद मरीजों की संख्या दो गुना से भी ज्यादा बढ़ गई है और अगर ऐसे ही केस बढ़ते रहे तो ये बीमारी काफी खतरनाक साबित हो सकती है.

एम्स की ओर से आईसीएमआर को एक प्रस्ताव भी भेजा गया है, जिसमें एवीएन के मामलों पर स्टडी करने का प्रस्ताव रखा गया है, जिससे इस बीमारी के मामलों पर अध्ययन किया जा सके.

डॉक्टरों के मुताबिक, जिन मरीजों में एवीएन के केस आ रहे हैं उन्हें कोविड के इलाज के दौरान स्टेरॉयड की हाई डोज दी गई थी, जिसका असर हड्डियों पर पड़ रहा है. एवीएन के मामले युवाओं और बुजुर्ग दोनों प्रकार के मरीजों में देखे जा रहे हैं.

चिंता की बात यह है कि इस बीमारी में शुरुआत में केवल हल्का दर्द ही महसूस होता है, जिसे लोग नजरअंदाज कर देते हैं और बाद में ये बीमारी अंदर ही अंदर हिप बोन को गलाना शुरू कर देती है. ऐसे में केवल हिप रिप्लेसमेंट सर्जरी करने का ही विकल्प बचता है.

एवैस्कुलर नेक्रोसिस के मरीजों का इलाज करने के लिए स्टेम सेल थेरेपी का इस्तेमाल किया जा रहा है. इसमें कोर डीकंप्रेशन नाम की सर्जिकल प्रक्रिया होती है, जिसमे जोड़ों के पास मृत हड्डी के एरिया में सर्जिकल ड्रिलिंग की जाती है. अस्पतालों में कई मरीजों पर इस प्रक्रिया का इस्तेमाल किया जाता है.

आर्थोपेडिक सर्जन डॉ. नितिन कुमार का कहना है कि जिन लोगों को कोरोना के दौरान अस्पतालों में भर्ती रहना पड़ा है. उन्हें अपने स्वास्थ्य की विशेष देखभाल करनी चाहिए. अगर किसी को जांघ और कूल्हे की हड्डियों में तेज दर्द रहना, चलने -फिरने में दिक्कत होना या जोड़ों में दर्द की परेशानी हो रही है तो तुरंत डॉक्टरों से सलाह लेनी चाहिए.

जिन लोगों को पहले सी ही अर्थराइटिस है उन्हें खास सावधानी बरतने की जरूरत है. अगर अर्थराइटिस का इलाज चल रहा है और कोविड से भी संक्रमित रह चुके हैं तो कूल्हे में दर्द को नजरअंदाज बिलकुल न करें ये एवीएन का लक्षण हो सकता है.

बुजुर्गों को इस बात का विशेष ध्यान रखने की जरूरत है. क्योंकि बढ़ती उम्र में हड्डियां कमजोर होने लगती है और अगर ऐसे में एवीनए की बीमारी हो गई तो स्थिति काफी खराब हो सकती है

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