दर्दनाक दास्तां: आतंकियों ने खिलाया था खून से सना चावल

उदय दिनमान डेस्कः देश की कल्‍पना, कश्‍मीर के बिना नहीं हो सकती और कश्‍मीर के बिना भारत का अस्तित्‍व नहीं है। अंतरराष्ट्ीय मंच पर एक बार फिर आतंकवाद की बात आयी और एक कश्मीरी ने कश्मीरी पंडितों पर हुए अत्याचार की जब दर्दनाक दास्तां सुनाई तो सभी दंग रह गए। हालांकि अब कश्मीर में शांति है और अलग प्रदेश बनने के साथ ही यहां पर अमन और चैन है। लेकिन कश्मीरी पंडितों की वह दर्दनाक दास्तां एक बार फिर विश्व के पटल पर छा गयी।

वॉशिंगटन में आयोजित एक कार्यक्रम में कॉलमनिस्‍ट सुनंदा वशिष्‍ठ ने मानवाधिकार मामलों पर हो रही सुनवाई के दौरान भारत की तरफ से कश्‍मीर पर देश का पक्ष रखा। उन्‍होंने इसके साथ ही कहा कि आतंकवाद के खिलाफ जो लड़ाई जारी है उसमें अंतरराष्‍ट्रीय सहयोग से इस क्षेत्र में मानवाधिकार की समस्‍या हल हो सकती है।


सुनंदा वशिष्‍ठ ने 400,000 से ज्‍यादा कश्‍मीरी पंडितों की हत्‍या को लेकर वर्ल्‍ड लीडर्स की चुप्‍पी पर भी सवाल उठाया। 90 के दशक में पाकिस्‍तान समर्थित आतंकियों ने इस समुदाय को बड़े पैमाने पर निशाना बनाया था और इसकी वजह से इन्‍हें घाटी छोड़कर जाना पड़ा था। वशिष्‍ठ के शब्‍दों में, ‘मानवाधिकार की हिमायत करने वाले तब कहा थे जब मेरे अधिकार मुझसे छीन लिए गए थे? तब मानवाधिकार के रक्षक क्‍या कर रहे थे जब मेरे बूढ़े और बीमार दादाजी मुझे हैवानियत से बचाने के लिए चाकू से मार डालने के लिए तैयार थे और एक कुल्‍हाड़ी मेरी मां को मारने के लिए तैयार थी।’

आपको बता दें कि जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाए जाने के खिलाफ एजेंडा चलाने और घड़ियाली आंसू वालों को कश्मीर की एक बेटी ने मुंहतोड़ जवाब दिया. दुनियाभर के बुद्धिजीवियों का एक वर्ग कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाए जाने से छटपटा रहा है और कश्मीर के भविष्य की चिंता में बिना वजह डूबा जा रहा है. वो भी तब जब ना तो उन्हें कश्मीर के इतिहास का पता है और न वर्तमान की खबर है. ऐसे लोगों को तो बस वही नजर आ रहा है, जो पाकिस्तान उन्हें दिखा रहा है और वहीं समझ आ रहा है, जो पाकिस्तान उन्हें समझा रहा है.

अब कश्मीर के इन फर्जी हमदर्दों को हिंदुस्तान की एक बेटी ने ऐसा जवाब दिया, जो उनसे सहन नहीं हो पा रहा है. दरअसल अमेरिकी कांग्रेस में मानवाधिकारों पर एक सम्मेलन चल रहा है, जहां कई मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाए जाने को कश्मीरी आवाम के मानवाधिकारों का उल्लंघन बता रहे हैं और भारत की मंशा पर सवाल उठा रहे हैं. हालांकि जब भारतीय मूल की अमेरिकी स्तंभकार और कश्मीरी पंडित सुनंदा वशिष्ठ के बोलने की बारी आई, तो उन्होंने अनुच्छेद 370 के खिलाफ उठने वाली हर आवाज को खामोश कर दिया.

सुनंदा वशिष्ठ ने 30 साल पहले कश्मीर के उन खूनी हालात को बयां किया, जिनकी वो खुद भुक्तभोगी हैं. उन्होंने कश्मीर में हिंदुओं के नरसंहार की वो कहानियां सुनाईं, जिसकी वो खुद चश्मदीद गवाह हैं. कश्मीर में मानवाधिकारों के नाम पर घड़ियाली आंसू बहाने वालों को हिंदुस्तान की बेटी का ये जवाब पसंद नहीं आएगा, क्योंकि सुनंदा वशिष्ठ ने कश्मीर और अनुच्छेद 370 को लेकर एजेंडा चलाने वाले पाकिस्तान का आतंकी सच दुनिया के सामने एक्सपोज़ कर दिया है.

सुनंदा वशिष्ठ ने कहा, ’मैं कश्मीर घाटी के हिंदू समुदाय से आती हूं. मैंने खुद साल 1990 के कश्मीर का वो दर्द सहा है, जब पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवादियों ने हजारों कश्मीरी पंडितों को अपना घर-बार छोड़ने पर मजबूर कर दिया था.’ मानवाधिकारों की आड़ लेकर कश्मीर की गलत छवि पेश करने वाले बुद्धिजीवियों से भारत की बेटी सुनंदा वशिष्ठ ने पूछा कि मानवाधिकारों के ठेकेदार उस समय कहां थे, जब 30 साल पहले आतंकवादियों ने कश्मीरी पंडितों को चुन-चुनकर मौत के घाट उतारा था. मानवाधिकारों के ठेकेदार उस वक्त कहां थे, जब कश्मीर में हिंदुओं का खुलेआम कत्ल किया जा रहा था, उनके घर जलाए जा रहे थे और हिंदू बहू बेटियों की इज्जत लूटी जा रही थी.

कश्मीरी पंडित और पेशे से कॉलमनिस्ट सुनंदा वशिष्ठ ने सवाल किया कि तब दुनियाभर के नेताओं की चुप्पी क्यों नहीं टूटी थी, जब पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद की वजह से 4 लाख हिंदू परिवारों को जान बचाकर कश्मीर से भागना पड़ा था. आपको बता दें कि 1990 के दशक में पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद ने कश्मीर में अपनी जड़े जमाना शुरू किया था और सबसे पहले हिंदुओं को निशाना बनाया गया था. लाखों हिंदुओं को जान बचाकर भागना पड़ा, जो आज भी अपने घर लौटने का इंतजार कर रहे हैं, जिनमें सुनंदा वशिष्ठ भी शामिल हैं. वो खुद को खुशकिस्मत मानती हैं, लेकिन हर कोई उनके जितना खुशकिस्मत नहीं था.

टॉम लैंटोस एचआर कमिशन अमरीकी संसद के निचले सदन हाउस ऑफ़ रिप्रज़ेंटेटिव्स का द्विपक्षीय समूह है जिसका लक्ष्य अंतरराष्ट्रीय रूप से मान्य मानवाधिकार नियमों की वकालत करना है.कमिशन की ओर से “भारत के पूर्व राज्य जम्मू और कश्मीर में ऐतिहासिक और राष्ट्रीय संदर्भ में मानवाधिकार की स्थिति की पड़ताल” के विषय पर सुनवाई का आयोजन किया गया था.

कमिशन की ओर से होने वाली इस तरह की विभिन्न सुनवाइयों में शामिल होने वाले ‘गवाह’ अमरीकी कांग्रेस को संबंधित विषय पर क़दम उठाने को लेकर सुझाव देते हैं.जम्मू-कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा देने वाले संविधान के अनुच्छेद 370 को निष्प्रभावी किए जाने और इसे दो केंद्र शासित राज्यों में बांटने के बाद मानवाधिकार की स्थिति को लेकर उठ रहे सवालों पर शुक्रवार को हुई टॉम लैंटोस एचआर कमिशन की इस सुनवाई में दो पैनल थे.

पहले पैनल में अमरीका के अंतरराष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता आयोग की आयुक्त अरुणिमा भार्गव थीं जिन्होंने भारत प्रशासित कश्मीर में अल्पसंख्यकों की स्थिति पर बात रखी. दूसरे पैनल में सुनंदा वशिष्ठ समेत छह लोग थे.पहले पैनल में शामिल अमरीकी अंतरराष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता आयोग की आयुक्त अरुणिमा भार्गव ने बताया कि पांच अगस्त को भारत सरकार द्वारा घाटी में पाबंदियां लगाए जाने के बाद शुरुआती हफ़्तों में ऐसी रिपोर्टें आईं कि लोग नमाज़ नहीं पड़ पाए या मस्जिदों में नहीं जा सके. उन्होंने कहा कि उसके बाद भी सख़्ती के कारण हिंदू और मुस्लिम समुदाय के लोग त्योहारों को मनाने के लिए एकत्रित नहीं हो पाए.

दूसरे पैनल की सबसे पहली वक्ता ओहायो यूनिवर्सिटी में मानवविज्ञान की एसोसिएट प्रोफ़ेसर हेली डुशिंस्की ने 370 को निष्प्रभावी किए जाने को ‘भारत का तीसरी बार किया कब्ज़ा’ बताया. उन्होंने कहा कि इसस पहले ‘भारत ने 1948 और फिर 1980 के दशक में अतिरिक्त सेना की तैनाती करके कश्मीर पर नियंत्रण किया था.’

वहीं मानवाधिकार की वकालत करने वालीं सेहला अशाई भारत सरकार पर कश्मीर के दमन का आरोप लगाया. उन्होंने कहा कि भारत द्वारा 370 को निष्प्रभावी बनाने से सभी धर्मों और समुदायों के लोग प्रभावित हुए हैं. उन्होंने इस संबंध में अमरीका से कूटनीतिक प्रयास करने की मांग की.

वहीं यूसरा फ़ज़िली नाम की पैनलिस्ट ने कहा कि भारत प्रशासित कश्मीर में उनके चचेरे भाई मुबीन शाह को हिरासत में ले लिया गया है. उन्होंने कहा, “बहुत से लोग सामने नहीं आ रहे हैं क्योंकि उन्हें परिजनों की चिंता है. वे सामान लाने तक बाहर नहीं जा पा रहे. इंटरनेट तक वहां नहीं हैं. स्वास्थ्य और बुनियादी सुविधाओं को बहार करने के लिए कांग्रेस को भारत पर दबाव डालना चाहिए.’पैनल में शामिल जॉर्जटाउन लॉ में सहायक प्रोफ़ेसर वाले अर्जुन एस. सेठी ने भी भारत के क़दम की आलोचना की और न सिर्फ़ कश्मीर बल्कि असम को लेकर केंद्र सरकार के रवैये पर भी सवाल उठाए.

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