सनातन संस्कृति में पितृ को देवतुल्य

नई दिल्ली:: पूर्वज भी अपने वंशजों से सम्मान चाहते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, जब किसी प्रिय की मौत होती है तो वह पितृदेव का रूप धारण कर लेते हैं और अपने वंशजों की रक्षा करते हैं। लेकिन वंशज उनकी पूजा न करें या तिरस्कार करें तो वह नाराज हो जाते हैं। अशुभ फलों की प्राप्ति होती है।

मान्यता है कि अगर आपके कार्यों में बाधाएं आ रही हैं और कोई भी काम सफल नहीं हो रहा है तो इसे पितरों के नाराज होने या पितृदोष का लक्षण माना जाता है। शास्त्रों के अनुसार, घर में अक्सर लड़ाई-झगड़ा होना, पितृ दोष का कारण माना जाता है।

मान्यता है कि पितृ नाराज रहते हैं तो संतान सुख में बाधा आती है। अगर संतान हुई है तो वह आपकी विरोधी रहेगी। आपको कष्टों का सामना करना पड़ेगा। मान्यता है कि पितरों के नाराज रहने के कारण घर की किसी संतान का विवाह नहीं होता है। अगर हो भी जाए तो वैवाहिक जीवन में दिक्कतों का सामना करना पड़ता है।

मान्यता है कि पितृ नाराज रहते हैं तो जीवन में आकस्मिक नुकसान का सामना करना पड़ता है। जातक को आर्थिक तंगी का सामना करना पड़ सकता है।पिंडदान करना चाहिए। गो-दान करें। पितरों की शांति के लिए अनुष्ठान करना चाहिए। कौवों को भोजन देना चाहिए।

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