तेहरान: अमेरिका और इजरायल ने 28 फरवरी को ईरान पर हमला किया था और अब जाकर तेहरान ने उसके विमानों को मार गिराना शुरू कर दिया है। इससे पहले भी ईरान ने कुछ मौकों पर अमेरिकी विमानों को ट्रैक करने की बात कही थी और उसने मिडिल ईस्ट के एयरबेस पर जरूर अमेरिकी अवाक्स विमान को गिराए थे लेकिन एफ-15 लड़ाकू विमान को ईरान के अंदर गिराना बहुत बड़ी बात है। ये एक बहुत एडवांस फाइटर जेट है और इसे ट्रैक करना और इसपर सटीक निशाना लगाने के लिए जिस टेक्नोलॉजी की जरूरत होती है, कम से कम वो ईरान के पास अभी तक नहीं थी। इसीलिए सवाल ये है कि आखिर ईरान ने अचानक अमेरिकी विमानों को कैसे गिराना शुरू कर दिया है?
एविएशन एक्सपर्ट्स का मानना है कि ईरान ने बहुत ज्यादा संभावना है कि अमेरिका के इस एडवांस फाइटर जेट को गिराने के लिए पैसिव इंफ्रारेड डिटेक्शन सिस्टम (PIR तकनीक) का इस्तेमाल किया है। यह एक ऐसा तरीका है जो पारंपरिक रडार सिस्टम से बिल्कुल अलग है। हालांकि अभी भी इस बारे में पूरी जानकारी साफ नहीं है लेकिन मिलिट्री एक्सपर्ट्स का मानना है कि ईरान के लिए पारंपरिक रडारों से अमेरिकी जेट को निशाना बनाना अत्यंत मुश्किल है।
एक रिपोर्ट के मुताबिक ईरान ने अमेरिकी F-15E स्ट्राइक ईगल को गिराने के लिए शायद पैसिव इंफ्रारेड डिटेक्शन सिस्टम का इस्तेमाल किया है। इसीलिए अब अमेरिका की हवाई ताकत और ईरान के आसमान में उसके वर्चस्व बनाने के दावे पर गंभीर सवाल खड़े हो गये हैं। ईरान ने अमेरिका के A-10 फाइटर जेट को मार गिराया है जिसके पायलट को सुरक्षित अमेरिकी सैनिकों ने रेस्क्यू कर लिया है।
सुरक्षा और खुफिया मामलों के विश्लेषक ब्रायन एलन ने ऑनलाइन एक ट्वीट शेयर करते हुए लिखा “पैसिव इंफ्रारेड डिटेक्शन सिस्टम से कोई रडार सिग्नल नहीं निकलता है। अमेरिका के इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सिस्टम न तो इसका पता लगा सकते हैं और न ही इसे जाम कर सकते हैं। यह उस तकनीक के लिए पूरी तरह से अदृश्य है जिस पर अमेरिका ने अपनी हवाई ताकत को मज़बूत बनाने के लिए खरबों डॉलर खर्च किए हैं।”
आसान भाषा में समझें तो पारंपरिक रडार को अमेरिकी फाइटर जेट बहुत आसानी से पकड़ सकते हैं और उसे खत्म कर सकते हैं लेकिन पैसिव इंफ्रारेड डिटेक्शन सिस्टम वो तकनीक है जिसे अमेरिकी फाइटर जेट पकड़ ही नहीं सकते हैं। इसीलिए सवाल ये है कि ईरान के पास ये आखिर कहां से आया? अगर ये पहले से था तो अभी तक इस्तेमाल क्यों नहीं किया?
पैसिव इन्फ्रारेड डिटेक्शन सिस्टम पारंपरिक रडार से मौलिक रूप से अलग होते हैं। पारंपरिक रडार-आधारित प्रणालियों के विपरीत पैसिव इन्फ्रारेड डिटेक्शन विमान से जो गर्मी निकलती है, उसके इंजन से जो धुआं निकलता है उससे विमान को ट्रैक कर लेता है।इस तकनीक के तहत विमान का पता लगाने के समय कोई इलेक्ट्रॉनिक संकेत नहीं निकलता है इसीलिए इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर के जरिए इसे जाम भी नहीं किया जा सकता है।
एफ-15ई जैसे आधुनिक अमेरिकी विमान फ्लेयर्स, चैफ और सोफिस्टिकेटेड इलेक्ट्रॉनिक युद्ध सूट जैसे एडवांस टेक्नोलॉजी से लैस हैं और अगर ईरान के पास कोई साधारण रडार रहता तो उसे कब का खत्म कर दिया गया होता। अमेरिका, ईरान के सभी पारंपरिक रडारों को खत्म कर चुका है।पैसिव इन्फ्रारेड डिटेक्शन सिस्टम रडार उत्सर्जन पर निर्भर नहीं करते हैं। वे कई ऐसे पहचान और जैमिंग तंत्रों की पकड़ में ही नहीं आते हैं जिनका मुकाबला करने के लिए पश्चिमी देशों ने अपने विमानों को डिजाइन कर रखा है।
इंफ्रारेड ट्रैकिंग का कॉन्सेप्ट नया नहीं है। हीट-सीकिंग मिसाइलें और इंफ्रारेड सेंसर दशकों से मौजूद हैं। लेकिन जो चीज बदलती हुई दिख रही है वह है इन सिस्टम्स का लेयर्ड एयर डिफेंस नेटवर्क्स में इंटीग्रेशन। हाल की रिपोर्ट्स ने पहले ही इस बदलाव की ओर इशारा किया है। एनालिस्ट्स ने ये भी सुझाव दिया था कि ईरान ने F-35 जैसे स्टील्थ एयरक्राफ्ट का पता लगाने के लिए भी इसी तरह की पैसिव ट्रैकिंग तकनीकों का इस्तेमाल किया हो सकता है।
आधुनिक एयर डिफेंस में आम तौर पर एक लेयर्ड अप्रोच शामिल होती है जिसमें रडार ट्रैकिंग, इलेक्ट्रॉनिक सर्विलांस, पैसिव इंफ्रारेड सेंसर और सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइल बैटरियों का मेल होता है। रिपोर्ट्स बताती हैं कि ईरान ने कई सिस्टम्स का इस्तेमाल करके एयरक्राफ्ट को इतनी देर तक ट्रैक किया होगा उसे मिसाइल से मार गिराना मुमकिन हो सका। इस तरह के सेटअप में पैसिव इंफ्रारेड ने एक साइलेंट ट्रैकर के तौर पर काम किया होगा जबकि दूसरे सिस्टम्स ने टारगेटिंग को और बेहतर बनाने में मदद की होगी। इसीलिए सवाल ये है चीन या रूस, आखिर वो कौन सा देश है जो ईरान की मदद कर रहा है?
