दर्द की इंतहा: अपने ही घर में हमको बना दिया ‘पराया’ !

संतोष ‘सप्ताषू’
देहरादून
। जिन गलियों,खेत-खलियानों और आॅगन में बचपन गूजरा और गांव की जिन पगडंडियों पर बचपन से यौवन का सफर तय किया। वह मातृभूमि आज बेगानी हो गयी सिर्फ एक शब्द प्रवासी से। दिल कितना रोया होगा उस पहाड़ी का जिसे यह नया और बेगाना सा नाम दिया गया। वह भी अपने ही घर में।

उत्तराखंड राज्य बनने के बाद दो जून की रोटी के लिए अपने गांव से पलायन कर शहर की चकाचैंध में इस जुगाड़ के लिए गया कि शायद फिर दिन आएंगे और अपनी मातृभूमि में जाउगा। लेकिन राज्य बनने के बाद इतना लंबा समय हो गया पर पहाड़ की हालत वैसी की वैसी रही। समय-समय पर अपनी मातृभूमि पर कदम रखता और फिर दो जून की रोटी के लिए चकाचैंध में खो जाता। जब कोरोना महामारी ने शहर की चकाचैंध से लात मारी तो मातृभूमि ही सहारा थी। वापस लौटा तो मातृभूमि की सरकार ने बेगाना कर दिया।

बता दें कि कोरोना महामारी के चलते पूरे विश्व में हा-हाकार मचा हुआ है और भारत भी इससे अछूता नहीं है। कोरोना वायरस ने पूरे देश में अपना जाल फैला दिया है। इसके कारण रोजी-रोटी छूट गयी तो मातृभूमि ही एक मात्र सहारा थी। सो लौट आया 18 साल बाद अपनी मातृभूमि। यह कहानी एक ऐसे युवा की जुबानी है,जिसने और मैने शिक्षा एक साथ ग्रहण की। मैं उत्तराखंड के पहाड़ों में भटकता रहा और वह दो जून की रोटी के लिए शहरों की चकाचैंध में खो गया।

मैं आज भी दो जून की रोटी की तलास कर रहा हूॅ और उसने 18 साल तक जीवन के हर सुख का आनंद लिया, जिसके लिए उसने पहाड़ से पलायन किया था। आज 18 साल बाद सहसा जब मुलाकात हुई तो उसने मुझे पहचान लिया। क्योंकि मैं आज भी पहाड़ ढयबरा की तरह ही हूॅ सो उसकी नजर पड़ते ही उसने पहचान लिया। हालांकि मैं पहचान नहीं पाया,लेकिन उसने जब अपना परिचय दिया तो मैं उसे पहचान गया।

हालांकि गूगल युग चल रहा है और संचार साधन इतने है कि वह मुझे और मैं उसे खोज सकता था, लेकिन वह सहाब बन गया था और मैं अभी भी पहाड़ी। न तो उसने और न मैने इस विषय पर कभी सोचा था। पत्रकारिता करता हू यह मेरा मित्र जानता था, सो वह मुझे खोजते हुए पहुंच गया मेरे पास।

बातों का सिलसिला जब शुरू हुआ तो उसने दिल के दर्द को बयां किया जो मेरे दिल को भी रूला गया। बात तब की थी जब 1994 में उत्तराखंड राज्य आंदोलन के दौरान हम स्कूल में पढ़ रहे थे और राज्य आंदोलन की लड़ाई में हम भी अप्रत्यक्ष रूप से कूद गये थे। समय के साथ-साथ आंदोलन की आग और आंदोलनकारियों के जजबे से राज्य मिला। तब तक हमने पढ़ाई भी पूरी कर ली थी और डिग्रियां बहुतायात मात्रा में जमा कर ली थी।

अब राज्य बन गया था सो उम्मीद थी कि कुछ होगा। राज्य बनने के कुछ सालों तक मित्र पहाड़ में ही दो जून की रोटी की उम्मीद पाले रहा और कुछ साल बाद पहाड़ से पलायन कर शहर की चकाचैंध में खो गया। आज जब 18 साल बाद मिला तो निराश, हताश। राज्य बनने के बाद से हमारे भाग्यविधाताओं की कार्यप्रणाली और राज्य के नौकरशाहों की अफसरशाही से वह टूट चूका है। कोरोना काल में पहाड़ लोटे इस युवा के पास जितना कुछ जमाशेष था वह भविष्य की योजनाओं के लिए धीरे-धीरे अब खत्म होने की कगार पर है।

भविष्य की योजनाओं पर चर्चा करते-करते मित्र ने एक ऐसी बात बतायी, जिसे सूनकर मन को आघात पहुंचा। प्रदेश की सरकार ने मुख्यमंत्री स्वरोजगार योजना चलायी। उसका प्रचार-प्रसार भी किया और उस योजना के लिए सरलीकरण के निर्देश भी दिए। लेकिन शहरों से पहाड़ लोटे युवाओं के लिए चुनौतियों का पहाड़ तो अभी भी खड़ा ही है।

मुख्यमंत्री स्वरोजगार योजना भी अन्य योजनाओं की तरह नौकरशाहों की अफसरशाही के सामने बोनी साबित हो रही है। अन्य योजनाओं में अगर कोई पहाड़ आकर स्वरोजगार करना चाहे तो उसकी राह में बैंकों का अडियल रवैया सबसे बड़ी बाधक है। मुख्यमंत्री स्वरोजगार योजना के लिए प्रदेश के लगभग 20000 लोगों ने आवेदन किया था उसमें से सिर्फ 5000 के करीब आवेदन ही स्वीकृत हुए और 15000 अस्वीकृत आवेदनों में मेरे मित्र का भी आवेदन था, जिस पर चर्चा और इसके बारे में जानकारी के लिए दून आने पर मुझसे मिला।

उसका पहाड़ में स्वरोजगार का सपना फिलहाल कोरोना के पांच माह में चकनाचून हो गया। फिर भी उसने उम्मीद नहीं छोड़ी है और बताया कि वह अपने संसाधनों पर स्वरोजगार शुरू करेगा। आगे से अपने भाग्यविधाताओं और नौकरशाहों की अफसरशाही के आगे नहीं झूकेगा।

बातचीत के दौरान उसने बताया कि पहाड़ का निवासी हूॅ और पहाड़ की तरह अडिग रहूंगा। कोरोना काल में अन्य शहर से अपने घर पहुंचने पर सरकार ने तो पहले ही प्रवासी कहकर हमें बेगाना बना दिया है। फिर वह हमारी मदद क्यों करेगी। प्रवासी शब्द पर काफी लंबी चर्चा हुई तो उन्होंने बताया कि जिस गांव में बचपन गुजारा, जवान हुए और जीवन को जीना सीखा आज हम वही बेगाने जैसे हो गए है। गांव की पगडंडियों पर चलते-चलते आज बचपन याद आता है और खुद को दोषी मानते हुए अब पहाड़ में रहकर ही स्वरोजगार करना चाहते है।

बता दें कि कोरोना काल में विभिन्न शहरों से अपने गांवों को लोटे लोगों के लिए अब पहाड़ में स्वरोजगार करना पहाड़ से कम नहीं है। फिर भी कई लोगों ने स्वरोजगार करना भी शुरू कर दिया है और कई लोग अभी योजनाएं बना रहे हैं। कोरोना के कारण आज पहाड़ में गांव के गांवों में कुछ रोनक तो लौटी है पर लोगों के सामने आज भी कोरोना की चुनौति है। संभवतः कोरोना की इस लड़ाई को जीतने के बाद पहाड़ में सब ठीक हो जाएगा।

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