मुंबई: भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के गवर्नर संजय मल्होत्रा ने बुधवार, 8 अप्रैल 2026 को चालू वित्त वर्ष (2026-27) की पहली द्विमासिक मौद्रिक नीति समीक्षा पेश की. वैश्विक स्तर पर बढ़ती अनिश्चितताओं और भू-राजनीतिक तनावों, विशेष रूप से पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष को देखते हुए, मौद्रिक नीति समिति (MPC) ने सर्वसम्मति से नीतिगत रेपो रेट को 5.25 प्रतिशत पर यथावत रखने का निर्णय लिया है.
गवर्नर मल्होत्रा ने अपने संबोधन में स्वीकार किया कि वैश्विक अर्थव्यवस्था इस समय कठिन दौर से गुजर रही है. पश्चिम एशिया (Isreal-Iran-US) में बढ़ते तनाव ने ग्लोबल सप्लाई चेन को बुरी तरह प्रभावित किया है, जिससे कच्चे तेल और ऊर्जा की कीमतों में भारी उछाल आया है. उन्होंने कहा, “संघर्ष के विस्तार से मार्च के बाद स्थितियां प्रतिकूल हुई हैं, जिससे वैश्विक वित्तीय बाजारों में अस्थिरता बढ़ी है.”
हालांकि, गवर्नर ने इस बात पर जोर दिया कि भारत की आर्थिक बुनियाद अभी भी बेहद मजबूत है. अन्य प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में भारत वैश्विक झटकों को सहन करने के लिए बेहतर स्थिति में है. सुरक्षित निवेश की तलाश में अमेरिकी डॉलर के मजबूत होने से अन्य मुद्राओं पर दबाव बढ़ा है, लेकिन भारत का विदेशी मुद्रा भंडार और राजकोषीय अनुशासन इसे मजबूती प्रदान कर रहे हैं.
आरबीआई ने वित्त वर्ष 2026-27 के लिए जीडीपी ग्रोथ का अनुमान 7% रखा है. वहीं, महंगाई को लेकर बैंक सतर्क है और इसके 4.5% रहने का अनुमान जताया गया है. गवर्नर ने स्पष्ट किया कि मुख्य प्राथमिकता मुद्रास्फीति को टिकाऊ आधार पर 4% के लक्ष्य की ओर ले जाना है.
रेपो रेट में कोई बदलाव न होने का मतलब है कि फिलहाल होम लोन, कार लोन या पर्सनल लोन की ईएमआई (EMI) में कोई बढ़ोतरी नहीं होगी. हालांकि, ब्याज दरों में कटौती की उम्मीद कर रहे कर्जदारों को अभी और इंतजार करना होगा. फिक्स्ड डिपॉजिट (FD) पर मिलने वाली ब्याज दरें भी मौजूदा स्तर पर स्थिर रहने की संभावना है.
