रानीपोखरी पुल टूटने की जांच रिपोर्ट शासन ने लौटाई, बताया जांच को अधूरा

देहरादून। रानीपोखरी पुल के टूटने की जांच रिपोर्ट शासन ने लौटा दी है। प्रमुख सचिव लोनिवि आरके सुधांशु ने जांच को अधूरा बताया है। साथ ही उन्होंने जांच समिति को सभी बिंदुओं पर विस्तृत जांच कर शीघ्र रिपोर्ट देने को कहा है।

ऋषिकेश-देहरादून राजमार्ग पर सौंग नदी पर बना रानीपोखरी पुल 27 अगस्त की सुबह टूट गया था। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के निर्देश पर शासन ने मुख्य अभियंता स्तर-प्रथम अयाज अहमद की अध्यक्षता में तीन सदस्यीय जांच समिति गठित की थी। समिति को एक सप्ताह में रिपोर्ट देने को कहा गया था।

जांच समिति ने एक सितंबर को पुल का सर्वे पूरा किया और माह के दूसरे सप्ताह में शासन को रिपोर्ट सौंपी। प्रमुख सचिव लोनिवि आरके सुधांशु ने जांच रिपोर्ट का परीक्षण किया और पाया कि समिति ने कई बिंदुओं पर विस्तृत जानकारी नहीं दी है। उन्होंने बताया कि जांच में खनन संबंधी बिंदु शामिल किए गए हैं, मगर अन्य तकनीकी बिंदुओं पर जानकारी अधूरी है।

लिहाजा, समिति के अध्यक्ष मुख्य अभियंता स्तर-एक अयाज अहमद को रिपोर्ट लौटा दी गई है। उन्हें निर्देश दिए गए हैं कि पुल टूटने के सभी पक्षों का भली-भांति परीक्षण कर लिया जाए। हर एक बिंदु पर स्पष्ट मत जाहिर किया जाए। ताकि जांच के आधार पर कार्रवाई की दिशा साफ हो सके। मुख्य अभियंता को यह भी हिदायत दी गई है कि वह संशोधित जांच रिपोर्ट जल्द से जल्द उपलब्ध कराएं।

जांच रिपोर्ट लौटाने के साथ दोबारा गतिमान स्थिति में आ गई है। लिहाजा, यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि किन बिंदुओं पर शासन को आपत्ति है। फिर भी इतना जरूर निकलकर आ रहा है कि पुल की डिजाइनिंग, रखरखाव व निर्माण की गुणवत्ता को स्पष्ट नहीं किया गया है। जांच रिपोर्ट में सिर्फ विस्तृत ढंग से खनन कार्य को इंगित किया गया है।

प्रथम दृष्टया भी अधिकारी अनियोजित खनन को मुख्य वजह मान रहे हैं। हालांकि, दूनघाटी में सभी नदियों में अनियोजित खनन किया जा रहा है और अधिकांश क्षेत्र में पुल स्थित हैं। ऐसे में सिर्फ एक बिंदु के आधार पर किसी जांच का पटाक्षेप नहीं किया जा सकता। यह भी वजह है कि शासन ने जांच रिपोर्ट पर सवाल उठाए हैं और तकनीकी विशेषज्ञ भी यही मान रहे हैं कि सभी पहलुओं की पड़ताल जरूरी है।

रानीपोखरी पुल का निर्माण लोक निर्माण विभाग (लोनिवि) ने वर्ष 1964 में किया था। यानी पुल की आयु महज 57 साल थी और इस तरह करीब आधी उम्र में ही इसकी क्षमता जवाब दे गई। 431.60 मीटर लंबे पुल के सपोर्टिंग पिलर के नीचे भूकटाव होने के चलते यह बीच से टूट गया। माना गया कि अनियोजित खनन के चलते ऐसा हुआ है। वहीं, बीते साल दिसंबर 2020 में लोनिवि ने करीब 40 लाख रुपये की लागत से सुरक्षा कार्य कर ब्लाक बनाए थे। हालांकि, यह तकनीक भी काम नहीं आ पाई।

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