1989 का अपहरणकांड !

श्रीनगर: जम्मू कश्मीर लिबरेशन फ्रंट (JKLF) के आतंकवादियों की ओर से 1989 में तत्कालीन केंद्रीय गृह मंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद की बेटी रुबैया सईद के अपहरण के मामले में सीबीआई ने एक व्यक्ति को गिरफ्तार किया है। यह गिरफ्तारी 36 साल पुराने इस मामले में हुई है। रुबैया सईद को पांच दिन बाद छुड़ाया गया था। इसके बदले में सरकार ने पांच आतंकवादियों को रिहा किया था।

सीबीआई ने जिस व्यक्ति को गिरफ्तार किया है, वह श्रीनगर के इश्बर निशात क्वार्टर के रहने वाले शफात अहमद शांगलू है। एजेंसी का मानना है कि वह इस अपहरण की घटना में शामिल था। यह घटना 8 दिसंबर, 1989 को हुई थी। रुबैया सईद को छुड़ाने के लिए तत्कालीन वी.पी. सिंह सरकार ने आतंकवादियों की मांग मानी थी।

उस समय बीजेपी भी सरकार का समर्थन कर रही थी। रुबैया सईद अब तमिलनाडु में रहती हैं। वह इस अपहरण मामले में सीबीआई के लिए एक गवाह हैं। सीबीआई ने 1990 के दशक की शुरुआत में इस मामले की जांच अपने हाथ में ली थी। आइए जानते हैं क्या था वो पूरा मामला?

घटना आज से साढ़े तीन दशक पहले की है, जब साल 1989 था। उस समय केंद्र में वीपी सिंह की सरकार थी और मुफ्ती मोहम्मद सईद देश के गृह मंत्री थे। कश्मीर में आतंकवाद धीरे-धीरे पैर पसार रहा था, लेकिन किसी ने यह कल्पना भी नहीं की थी कि आतंकी देश के गृह मंत्री के घर तक पहुंच जाएंगे।

8 दिसंबर 1989 की शाम को पेशे से डॉक्टर रूबिया सईद श्रीनगर के लाल डीड अस्पताल से अपनी ड्यूटी खत्म करके एक मिनी बस से घर लौट रही थीं। वह सिर्फ 23 साल की थीं। उन्हें जरा भी अंदाजा नहीं था कि उस बस में सफर कर रहे कुछ लोग मुसाफिर नहीं, बल्कि जम्मू-कश्मीर लिबरेशन फ्रंट (JKLF) के आतंकी हैं।

सदर थाना क्षेत्र के पास बस को रोका गया और बंदूक के बल पर रूबिया को अगवा कर लिया गया। जैसे ही यह खबर दिल्ली पहुंची, हड़कंप मच गया। देश के गृह मंत्री की बेटी आतंकियों के कब्जे में थी। यह भारत सरकार के लिए एक बहुत बड़ी चुनौती और शर्मिंदगी का विषय बन गया था। रूबिया को अगवा करने के पीछे जेकेएलएफ का मकसद बिल्कुल साफ था।

जेल में बंद अपने खूंखार साथियों को छुड़वाना। अपहरणकर्ताओं ने सरकार के सामने एक शर्त रखी। उन्होंने कहा कि अगर वे रूबिया की सलामती चाहते हैं, तो उनके पांच साथियों को रिहा करना होगा। सरकार मुश्किल में थी। एक तरफ गृह मंत्री की बेटी की जान का सवाल था, तो दूसरी तरफ देश की सुरक्षा और आतंकवादियों के सामने न झुकने की नीति।

कई दिनों तक बातचीत चली। पर्दे के पीछे बहुत कुछ हुआ, जिसे आज भी ‘कूटनीतिक और राजनीतिक रस्साकशी’ कहा जाता है। आखिरकार, 13 दिसंबर 1989 को सरकार को झुकना पड़ा। यह भारतीय लोकतंत्र के लिए एक बहुत भारी दिन था। सरकार ने आतंकवादियों की मांग मान ली और पांच खूंखार आतंकवादियों को रिहा कर दिया गया। इसके बदले में रूबिया सईद को छोड़ दिया गया।

रूबिया घर वापस आ गईं, लेकिन इस घटना ने कश्मीर में आतंकवादियों के हौसले बुलंद कर दिए। उन्हें लगा कि अगर वे किसी बड़े आदमी को किडनैप कर लें, तो वे सरकार को अपने इशारों पर नचा सकते हैं। कई विशेषज्ञ मानते हैं कि कश्मीर में आतंकवाद के भीषण दौर की असली शुरुआत इसी घटना के बाद हुई थी।

रूबिया की रिहाई के बाद यह मामला पुलिस जांच में आया, फिर टाडा (TADA) कोर्ट में गया। 1990 के दशक की शुरुआत में जांच सीबीआई को सौंप दी गई। लेकिन, कश्मीर के हालात, राजनीतिक दबाव और गवाहों के डर के कारण यह केस सालों तक ठंडे बस्ते में पड़ा रहा। फाइलें धूल फांकती रहीं। कई सरकारें आईं और गईं, लेकिन उन अपहरणकर्ताओं पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं हो सकी। लोग भूलने लगे थे कि ऐसा कोई केस भी था। लेकिन कानून अपना काम कर रहा था, भले ही रफ्तार धीमी थी।

इस केस में नया मोड़ तब आया जब 2019 में टेरर फंडिंग के एक अलग मामले में जेकेएलएफ के मुखिया यासीन मलिक को गिरफ्तार किया गया। यासीन मलिक वही शख्स है जिस पर रूबिया सईद के अपहरण का मास्टरमाइंड होने का आरोप है। मलिक की गिरफ्तारी ने सीबीआई को एक नया मौका दिया। जांच एजेंसी ने फिर से पुरानी फाइलों को खोला। गवाहों को ढूंढा गया, सबूतों को दोबारा परखा गया।

जांच में तेजी आई और यह साफ हो गया कि अब हिसाब चुकता करने का वक्त आ गया है। जनवरी 2024 में सीबीआई ने यासीन मलिक समेत 10 लोगों के खिलाफ टाडा कोर्ट में चार्जशीट दाखिल की। इसमें अली मोहम्मद मीर, मोहम्मद ज़मां मीर, इकबाल अहमद गांदरू जैसे नाम शामिल थे। इन पर अपहरण, आपराधिक साजिश और अवैध रूप से बंधक बनाने जैसे गंभीर आरोप लगाए गए।

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