अनोखा गांवः भारत के इस खूबसूरत गांव में है अपना कानून! देखे वीडियो

उदय दिनमान डेस्कः किसी लोकतांत्रिक देश में कोई गांव अगर इससे अलग हो तो आश्चर्य होगा है। क्यों न हो! जब पूरे देश में एक संविधान है तो यहां का संविधान अलग कैसे हो सकता है। लेकिन यह सत्य है। यह हम नहीं कह रहे हैं आप स्वयं गूगल पर सर्च करते इस गांव के बारे में जान सकते हैं। आखिर क्या कारण है कि इस गांव के लोग कानून को नहीं मानते और देश में इस गांव के बारे में संसद में क्यों बात नहीं उठती और क्यों हमारे जनप्रतिनिधि कुछ नहीं करते। ऐसे कई अनगिनत प्रश्न है जो मेरे भी मन में थे। लेकिन जब-जब दैवीय शक्ति की बात आती है तो सभी प्रश्न एक ही स्थान पर ठहर जाते हैं। उस असीम शक्ति के आगे। सिर्फ यही नहीं यह पूरी घाटी खूबसूरत भी है और यहां आकर आप खुद को स्वर्ग में पहुंचने की अनुभूति करेंगे।चलिए जानते हैं इस गांव के बारे में विस्तार से-

भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश है, लेकिन अगर कहा जाए कि इसी मुल्क में एक ऐसा गांव भी है, जहां भारत का संविधान नहीं माना जाता.हिमाचल प्रदेश में एक ऐसा गांव है, जहां के लोग भारत के संविधान को न मानकर अपनी हजारों साल पुरानी परंपरा को मानते हैं. पहाड़ियों से घिरे हिमाचल प्रदेश के कुल्लू जिले में है ये छोटा सा गांव ‘मलाणा’.कहा जाता है कि दुनिया को सबसे पहले लोकतंत्र यहीं से मिला था.प्राचीन काल में इस गांव में कुछ नियम बनाए गए, इन नियमों को बाद में संसदीय प्रणाली में बदल दिया गया.

इस गांव के अपने खुद के दो सदन हैं. एक छोटा सदन और एक बड़ा सदन.बड़े सदन में कुल 11 सदस्य होते हैं, जिसमें 8 सदस्य गांव वालों में से चुने जाते हैं, जबकि तीन अन्य कारदार, गुर और पुजारी स्थायी सदस्य होते हैं.घर का सबसे बुजुर्ग व्यक्ति ही प्रतिनिधित्व करता है. वहीं, ऊपरी सदन में किसी सदस्य की मृत्यु हो जाए तो पूरे ऊपरी सदन का दोबारा गठन किया जाता है.सिर्फ़ सदन ही नहीं बल्कि मलाणा गांव का अपना प्रशासन भी है. कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए इनके अपने कानून हैं.

अब बारी आती है सदन में सुनवाई की. सदन में हर तरह के मामलों को निपटाया जाता है. यहां फैसले देवनीति से तय होते हैं. संसद भवन के रूप में ऐतिहासिक चौपाल लगाई जाती है.ऊपरी सदन के 11 सदस्य ऊपर बैठते हैं और निचली सदन के सदस्य नीचे बैठे होते हैं.यूं तो हर तरह के फैसलों का यहीं पर निपटारा हो जाता है, लेकिन अगर कोई ऐसा मामला फंस जाए जिसको समझ पाना मुश्किल हो रहा हो, तो ऐसे में ये मामला सबसे अंतिम पड़ाव पर भेज दिया जाता है. यानी की अब इस फैसले को जमलू देवता के सुपुर्द कर दिया जाता है.

ये गांव वाले जमलू ऋषि को अपना देवता मानते हैं. इन्ही का फैसला सच्चा और अंतिम माना जाता है.किसी मामले को जमलू देवता के हवाले करने की बाद बहुत ही अजीबो गरीब तरीके से फैसला किया जाता है. जिन दो पक्षों का मामला होता है, उनसे दो बकरे मंगाए जाते हैं.दोनों ही बकरों की टांग में चीरा लगाकर बराबर मात्रा में जहर भर दिया जाता है.

जहर भरने के बाद बकरों के मरने का इंतजार होता है और जिस पक्ष का बकरा पहले मरता है, वह दोषी होता है.अब इस अंतिम फैसले पर कोई सवाल भी नहीं खड़े कर सकता है, क्योंकि इनका मानना है कि यह फैसला खुद जमलू देवता ने सुनाया है.हालांकि साल 2012 के बाद से इस गांव में काफी बदलाव देखने को मिले हैं. मसलन पहले यहां चुनाव भी नहीं होता था, लेकिन साल 2012 के बाद से यहां चुनाव होने लगे हैं.

इस गांव में अकबर से जुड़ी एक रोचक कहानी भी है. मलाणावासी अकबर को पूजते हैं. यहां साल में एक बार होने वाले ‘फागली’ उत्सव में ये लोग अकबर की पूजा करते हैं.लोगों की मान्यता है कि बादशाह अकबर ने जमलू ऋषि की परीक्षा लेनी चाही थी, जिसके बाद जमलू ऋषि ने दिल्ली में बर्फबारी करा दी थी. एक दिलचस्प बात और है कि ये लोग खुद को सिकंदर का वंशज बताते हैं.

इतिहास से जुड़े इनके पास कोई सबूत तो नहीं हैं, लेकिन इनके अनुसार जब सिकंदर भारत पर आक्रमण करने आया था, उस दौरान कुछ सैनिकों ने उसकी सेना छोड़ दी थी. इन्हीं, सैनिकों ने मलाणा गांव बसाया, यहां तक कि यहां के लोगों का हाव-भाव और नैन-नक्श भी भारतीयों जैसे नहीं हैं. बोली से लेकर शाररिक बनावट तक ये लोग भारतीयों से एकदम अलग नजर आते हैं.

इस विचित्र गांव में इसके अलावा और भी कई रहस्य हैं, जो इस गांव की ओर लोगों का ध्यान खींचते हैं.रहस्य से भरे इस गांव में बाहरी लोगों के कुछ भी छूने पर पाबंदी है. इसके लिए इनकी ओर से बकायदा नोटिस भी लगाया गया है, जिसमें साफ तौर पर लिखा गया है कि किसी भी चीज को छूने पर एक हजार रुपए का जुर्माना देना होगा.

इनके जुर्माने की रकम 1000 से लेकर 2500 रुपए तक है. किसी भी सामान को छूने की पाबंदी के बावजूद भी यह स्थान पर्यटकों को आकर्षित करता है.बाहर से आए लोग दुकानों का सामान नहीं छू सकते. पर्यटकों को अगर कुछ खाने का सामान खरीदना होता है तो वह पैसे दुकान के बाहर रख देते हैं और दुकानदार भी सामान जमीन पर रख देता है.

पर्यटकों के लिए इस गांव में रुकने की भी कोई सुविधा नहीं है. पर्यटक गांव के बाहर अपना टेंट लगाकर रात गुजारते हैं.रहस्य से भरे इस गांव का एक और सच यह है कि यहां नशे का व्यापार भी खूब फलता-फूलता है. मलाणा गांव की चरस पूरी दुनिया में मशहूर है, जिसे मलाणा क्रीम कहा जाता है.

यही नशा सरकार के लिए भी टेढ़ी खीर साबित होता है. प्रशासन को नशे के व्यापार पर रोक लगाने के लिए काफी मशक्कत करनी पड़ती है. कई अभियान चलाए जाते रहे हैं, लेकिन फिर भी यहां से भारी मात्रा में चरस और अफीम की तस्करी होती है. लेकिन अगर नशे को छोड़ दिया जाए तो हिमाचल के पहाड़ों में बसे इस गांव ने कई रहस्य इतिहास की गर्त में छुपा रखे हैं.

मलाना हिमाचल प्रदेश का एक गांव है । यह गांव मालाना क्रीम यानी कि हशीश के लिए सुप्रसिद्ध है । यह भारत देश के हिमाचल प्रदेश राज्य में स्थित है. हिमाचल प्रदेश के बाकी पर्यटन स्थलों से बिलकुल अलग मलाणा, नाला में एक एकांत गांव है, जो पार्वती घाटी की एक तरफ की घाटी है। मलाणा या मलाणा गांव कुल्लू जिले में स्थित है जो अपनी अपनी मजबूत संस्कृति और धार्मिक मान्यताओं के लिए जाना जाता है। यह जगह उन लोगों के लिए बहुत खास है जो आध्यात्मिक मार्गदर्शन चाहते हैं। यह स्थल सभी एडवेंचर प्रेमियों के लिए आदर्श जगह है क्योंकि मलाणा तक ट्रेकिंग करके भी जा सकते हैं। इसके अलावा मलाणा में मंदिर मदग्नि मंदिर और रेणुका देवी के मंदिर प्रमुख आकर्षण है। यह दोनों मंदिर एक दूसरे के निकट स्थित हैं, जहाँ विभिन्न देवी देवताओं की पूजा की जाती है।

मलाणा के इतिहास की बात करें तो बता दें की यहाँ के लोग आर्यों के पूर्वज हैं। जिन्हें अपनी स्वतंत्रता मुगल शासनकाल के दौरान मिली जब अकबर ने लोगों की परेशानी दूर करने के लिए इस जगह का दौरा किया था। अकबर ने एक ब्यान भी पारित किया कि गाँव के लोगों को अब कर( टैक्स) भुगतान करने की जरूरत नहीं है। यह एक ऐसा लौता गाँव हैं जहाँ पर अकबर की पूजा की जाती है। इसके अलावा अन्य सबूत कहते हैं कि मलाणा के लोग अलेक्जेंडर द ग्रेट (सिकंदर )की सेना के बंशज हैं।यहाँ की सबसे खास बात यह है कि इस जगह पर भारतीय कानून नहीं चलते, यहाँ की अपनी संसद है जो सारे फैसले करती है। दिल्ली के व्यापारी आर्यन शर्मा ने 2004 में मलाणा को अपनाया। साल 2008 जनवरी में, मलाणा में आग लगने से प्राचीन मंदिरों के कई सांस्कृतिक संरचना नष्ट हो गए।

मालन एक हिल स्टेशन है जिसके जैसा और कोई दूसरा नहीं है। मलाणा में आप जो कर सकते हैं वो आश्चर्यजनक रूप से अद्वितीय हैं! अगर आप मलाणा की यात्रा करने जा रहे हैं तो यहाँ कि गतिविधियों पर भी एक नजर डालें।द मुज़िक कैफे मलाणा का एक शांत कैफे है। स्नग रूम, सजावट और स्वादिष्ट भोजन इस जगह के प्लस पॉइंट हैं, अगर आप लकी हैं तो यहाँ मालिक आपको अपने शानदार कौशल भी दिखायेंगे।यहां के घने जंगलों में ट्रैकिंग के बिना मलाणा की यात्रा अधूरी है। ट्रेक आपको शानदार घाटी से लेकर जाता है और यह पानी के आकर्षक झरने के पास तक जाता है जो सच में देखने लायक है।

मलाणा कुल्लू का प्रमुख पर्यटन स्थल है। अगर आप इस क्षेत्र की यात्रा करना चाहते हैं तो बता दें कि यहाँ जाने का सबसे अच्छा समय मार्च से जून तक यानी ग्रीष्मकाल है। अगर आप यहाँ की साहसिक गतिविधियों में भाग लेना चाहते हैं या बर्फबारी देखना चाहते हैं तो सर्दियाँ सबसे अच्छी हैं। मानसून के मौसम में कुल्लू जाने से बचना चाहिए क्योंकि इस मौसम में भूस्खलन की संभावनाएं काफी होती है, जिसकी वजह से यात्रा करना जोखिम भरा हो सकता है।मलाणा कुल्लू के पास स्थित प्रमुख पर्यटन स्थल है, अगर आप मलाणा के अलावा इसके पास के प्रमुख पर्यटन स्थलों की यात्रा करना चाहते हैं तो नीचे दी गई जानकारी जरुर पढ़ें इसमें हम आपको मलाणा के पास के प्रमुख स्थलों के बारे में बता रहे हैं।

हिमाचल प्रदेश के कुल्लू जिले में पार्वती नदी के किनारे पार्वती घाटी में स्थित मणिकरण को सिखों और हिंदुओं दोनों के लिए एक प्रमुख तीर्थस्थल है। यहाँ का गर्म झरने, धार्मिक प्रवृत्तियां और खूबसूरत वातावरण बहुत से पर्यटकों को आकर्षित करता है। मणिकरण साहिब सिखों का प्रसिद्ध गुरुद्वारा और तीर्थ स्थान है। इसका संबंध सिख धर्म के पहले गुरु, गुरु नानक से संबंधित है। इस गुरुद्वारे अलावा यहां गर्म पानी के झरने हैं। मणिकरण साहिब, मलाणा बस स्टैंड से 25 किमी की दूरी पर स्थित है।

भंटर एक हरियाली भरी जगह है जहां पर कई मंदिर स्थित है, जहां की सैर आपको जरुर करना चाहिए। यहां आप बहने वाली ब्यास नहीं में वाइट वाटर राफ्टिंग के लिए भी जा सकते हैं। भंटर हिमाचल प्रदेश के हिल स्टेशन और भीड़ भाड़ वाले पर्यटन स्थलों से अलग एक सरल और शांत जगह है। मलाणा से भंटर की दूरी 38 किलोमीटर है।

खीरगंगा मलाणा शहर से लगभग 43 किमी दूर स्थित है जो हिमालय के पहाड़ों के गर्म झरनों और मनोरम दृश्यों के प्रसिद्ध एक पर्यटन स्थल है। खीरगंगा के इलाके घने जंगल, कैंपिंग, नेचर वॉकिंग और माउंटेन क्लाइम्बिंग के जरिए ट्रैकिंग के लिए बेहद खास है। खीरगंगा में पर्यटक अपने प्रवास के दौरान कुछ लैंडस्केप फोटोग्राफी का आनंद लें सकते हैं। हरे भरे जंगलों के माध्यम से सूर्यास्त और ट्रेकिंग के अविश्वसनीय दृश्य का अनुभव लेना बेहद खास साबित हो सकता है।

बिजली महादेव मंदिर कुल्लू का एक प्रमुख मंदिर है जो ’काश’ शैली में बना है। इस मंदिर में एक शिव लिंगम स्थापित है। पारबती, गार्सा, भुंटर और कुल्लू घाटियों से घिरा चमत्कारों और रहस्यों से भरा हुआ यह मंदिर पहाड़ी के ऊपर स्थित है। पहाड़ी के नीचे एक छोटा था गाँव है और इसका नाम बिजली महादेव के नाम पर रखा गया है। बिजली महादेव मंदिर को इसका नाम यहां होने वाले चमत्कार के बाद मिला है। यहां के स्थानीय लोगों का कहना है कि हर 12 साल में इस मंदिर के अंदर रखी शिवलिंग के ऊपर बिजली गिरती है और यह शिवलिंग कई टुकड़ों में टूट जाती है। इसके बाद मंदिर के पुजारी शिवलिंग को मक्खन की मदद से जोड़ दिया जाता है और यह शिवलिंग कुछ समय बाद अपने पुराने स्वरुप में आ जाती है। मलाणा से मंदिर बिजली महादेव मंदिर की दूरी 43 किलोमीटर है।

तीर्थन घाटी कुल्लू में घूमने की अच्छी जगह है। जो लोग शांति की तलाश में हैं वो तीर्थन घाटी की यात्रा कर सकते हैं। बहती नदियों, हरी-भरी घाटियों, और झीलों तीर्थन घाटी ग्रेट हिमालयन नेशनल पार्क के बफर जोन में स्थित है। तीर्थन घाटी साहसिक गतिविधियों में प्रचुर है और प्रकृति प्रेमियों के लिए स्वर्ग के सामान है। पर्यटक यहां ट्राउट फिशिंग / रैपलिंग / रॉक क्लाइम्बिंग का मजा ले सकते हैं। मलाणा से तीर्थन घाटी की दूरी 87 किलोमीटर है।

मलाणा के पास स्थित चंद्रखानी दर्रा एक ट्रेक मार्गों में से एक है जहां पर्यटक सर्दियों और गर्मियों दोनों में जा सकते हैं। 13,500 फीट पर स्थित चंद्रखनी दर्रा हिमालय पर उच्च ट्रेकिंग स्थल को एक्स्प्लोर करने के लिए सही अवसर प्रदान करता है। चंद्रखनी दर्रे पर ट्रेकिंग पर्यटकों को हिमाचल प्रदेश के दूरस्थ, पहाड़ी संस्कृतियों से परिचित करवाएगी। कुल्लू घाटी की सुंदरता और पर्वत चोटियों की उंचाई के साथ यह जगह हर प्रकृति प्रेमी के दिल को खुश कर देती है।

पार्वती घाटी ट्रेक हिमालयी क्षेत्र में सबसे चुनौतीपूर्ण ट्रेक में से एक के रूप में माना जाता है, जो रोमांच की तलाश करने वालों के लिए एकदम सही है। यहाँ के चारों ओर के मनमोहक दृश्य आपको अपनी सुंदरता से मंत्रमुग्ध कर देंगे। पार्वती घाटी ट्रेक काफी लंबा और काफी हैरान कर देने वाला है लेकिन यह बेहद शानदार है। जैसे-जैसे ऊंचाई बढ़ती है, आसपास के घने जंगलों, हरे-भरे घास के मैदान और नदियाँ आपको अपने आकर्षण से मोहित कर देंगे। पार्वती घाटी ट्रेक, हिमालय पास ट्रेक के बाद सबसे ज्यादा पसंद किये जाने वाले ट्रेक में से एक है।

कैसधार कुल्लू घाटी का एक प्रमुख और आकर्षक पिकनिक स्थल है, जो चारों ओर से ऊंचे देवदार के पेड़ों से घिरा है। कैसधार, कुल्लू से लगभग 15 किमी दूर खजियार में स्थित है जो अपनी प्राकृतिक सुंदरता के लिए जाना जाता है। कैसधार प्रकृति की गोद में कुछ समय बिताने के लिए एक अच्छी जगह है। यह स्थान पास की घाटी और गाँव का एक शानदार दृश्य प्रस्तुत करता है। कैसरधर एक शानदार ट्रेकिंग स्थल है जो देवदार और नीले देवदार के जंगल से होकर गुजरता है। कैसरधर, मलाणा से 57 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है।

हनोगी माता मंदिर कुल्लू के प्रसिद्ध धार्मिक केन्द्रों में से एक है। यह मंदिर एक छोटा सा मंदिर है जो एक छोटी सी पहाड़ी के ऊपर स्थित है। कुल्लू मनाली क्षेत्र में किसी भी अन्य पवित्र मंदिर की तरह हनोगी माता मंदिर अपने आप में बेहद खास है। हिंदू देवी माता हनोगी को समर्पित यह मंदिर एक नीचे चल रही धारा, पहाड़ी से घाटियों को देखने के साथ एक पवित्र धार्मिक स्थल है। धार्मिक पर्यटकों के अलावा यह मंदिर एडवेंचर पसंद करने वाले लोगों को भी आकर्षित करता है, यहां सनसेट व्यू के साथ क्लाइम्बिंग एडवेंचर के लिए एक आदर्श जगह है। मलाणा से हनोगी माता मंदिर की दूरी 68 किलोमीटर है।

भृगु झील मनाली का एक प्रमुख पर्यटन स्थल है जिसका नाम ऋषि भृगु के नाम पर पड़ा है जिनके बारे में कहा जाता है कि वे इस झील के पास ध्यान करते थे। इस झील को एक प्राचीन लोककथा के कारण पूल ऑफ गॉड्स ’के रूप में भी जाना जाता है, जो बताती है कि देवताओं ने इसके पवित्र जल में डुबकी लगाई थी। यहां के स्थनीय लोगों का मानना है कि इसी वजह से यह झील कभी पूरी तरह से जम नहीं पाती। भृगु झील रोहतांग दर्रे के पूर्व में स्थित है और गुलाबा गांव से 6 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। भृगु झील, मलाणा से 101 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है।

वैष्णो देवी मंदिर कुल्लू का एक प्रमुख मंदिर है जो आपको मिनी वैष्णो देवी ’की यात्रा का शानदार अनुभव देगा। वैसे तो इस मंदिर को महादेवी तीर्थ के रूप में जाना जाता है, कुल्लू में वैष्णो देवी मंदिर ब्यास नदी के तट पर स्थित है और मनाली के रास्ते पर कुल से लगभग 2 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। यह मंदिर अपने रास्ते पर विशाल जंगलों, सेब के बागों और राजसी पहाड़ियों के साथ शानदार दृश्य देता है। शांति के माहौल के साथ, वैष्णो देवी मंदिर कुल्लू में धार्मिक स्थानों में सबसे अधिक देखे जाने वाले मंदिरों में से एक बन गया है। तीर्थयात्रियों के लिए इस मंदिर परिसर में भगवान शिव का मंदिर भी है। मलाणा से वैष्णो देवी मंदिर की दूरी लगभग 47 किलोमीटर है।

नग्गर हिमाचल प्रदेश राज्य के कुल्लू जिले में स्थित है। यह एक छोटा शहर है जो अपनी आश्चर्यजनक प्राकृतिक सुंदरता के लिए प्रसिद्ध है। यह पर्यटन स्थल उन लोगों के लिए बेहद खास जगह है जो प्रकृति की गोद में रहकर आराम करना चाहते हैं। नग्गर में आप ट्रेकिंग और कैंपिंग का भी लुत्फ उठा सकते हैं। आपको बता दें कि नग्गर में एक महल भी स्थित है जिसको अब एक रिटेज होटल में बदल दिया गया है, जहां पर कोई भी जा सकता है। इसके अलावा नग्गर में एक लोक कला संग्रहालय और एक गर्म पानी का झरना है, जहां पर्यटकों को जरुर जाना चाहिए। मलाणा से नग्गर की दूरी 65 किलोमीटर है।

सुल्तानपुर पैलेस को पहले रूपी पैलेस कहा जाता था और नए रूप पुराने अवशेषों पर बनाया गया था जो भूकंप में क्षतिग्रस्त हो गया था। इस महल में विभिन्न वाल पेंटिंग और पहाड़ी शैली की वास्तुकला और औपनिवेशिक शैली का अद्भुत मिश्रण है। बता दें कि इस पैलेस में महल कुल्लू घाटी के पूर्ववर्ती शासकों का निवास स्थान है।मलाणा जाने के लिए, आपको सबसे पहले कसोल की यात्रा करना होगी, जहाँ से आपको जरी नामक जगह तक पहुँचने की आवश्यकता है जो कि लगभग 21.9 किलोमीटर दूर है। जरी पहुँचने के बाद आप मलाणा के लिए एक टैक्सी किराए पर ले सकते हैं जो आपसे गाँव के केंद्र तक ले जाने के लिए 800 रूपये चार्ज करते हैं।

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