आईएनए–आज़ाद हिंद फ़ौज की बालक सेना के बच्चों को किसने प्रेरित किया

देवेंद्र कुमार बुडाकोटी
भारतीय राष्ट्रीय सेना (आईएनए)–आज़ाद हिंद फ़ौज का इतिहास भारतीय विद्यालयों की पाठ्यपुस्तकों में
प्रमुखता से नहीं पढ़ाया जाता। भारत की स्वतंत्रता के कई वर्षों बाद आईएनए के पूर्व सैनिकों को औपचारिक रूप
से स्वतंत्रता सेनानी के रूप में मान्यता दी गई और भारत सरकार द्वारा उन्हें पेंशन प्रदान की गई।

भारत की स्वतंत्रता में योगदान देने वाले अनेक कारणों में एक प्रमुख कारण ब्रिटिश क्राउन के प्रति भारतीय सेना
और नौसेना के जवानों की निष्ठा का क्षरण था। इस परिवर्तन पर सुभाष चंद्र बोस, जिन्हें लोकप्रिय रूप से नेताजी
कहा जाता है, की सैन्य गतिविधियों और नेतृत्व का गहरा प्रभाव पड़ा।नेताजी का आह्वान—“तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आज़ादी दूँगा”—महात्मा गांधी के अहिंसा और सविनय अवज्ञाके दर्शन से स्पष्ट रूप से भिन्न था।

दिल्ली के लाल किले में चले आईएनए के मुकदमों ने इस संगठन को पुनः राष्ट्रीय चर्चा के केंद्र में ला दिया।
आईएनए अधिकारियों पर देशद्रोह, हत्या और अत्याचार के आरोप लगाए गए। किंतु मुकदमों के दौरान जो
जनाक्रोश उमड़ा, वह अभूतपूर्व था और ब्रिटिश अधिकारियों के लिए काफी हद तक अप्रत्याशित भी। इन मुकदमों
ने भारतीय सेना और नौसेना के कुछ वर्गों में असंतोष और विद्रोह की भावना को और भड़काया तथा पूरे देश में
स्वतंत्रता आंदोलन को नई ऊर्जा दी। इनसे आईएनए की सर्व-महिला इकाई ‘रानी झांसी रेजिमेंट’ पर भी व्यापक
जनध्यान गया।

फिर भी, आईएनए की बालक सेना के उन बच्चों के बारे में बहुत कम जानकारी उपलब्ध है, जिनमें कुछ की आयु
मात्र बारह वर्ष थी। लगभग 46 किशोरों को दो वर्ष के सैन्य प्रशिक्षण के लिए जापान भेजा गया, जिन्हें “टोक्यो
कैडेट्स” के नाम से जाना गया। द्वितीय विश्व युद्ध में जापान की पराजय और आत्मसमर्पण के बाद उन्हें निर्धारित
समय से पहले ही वापस भेज दिया गया।

मैंने बालक सेना के बारे में केवल सुना भर था, जब तक कि मुझे इसके एक पूर्व कैडेट, जयराज सी. राजाराव, जो
अब 94 वर्ष के हैं, का एक छायाचित्र नहीं मिला। यह तस्वीर 7–8 फरवरी 2026 को मलेशिया यात्रा के दौरान
प्रधानमंत्री मोदी के साथ उनकी मुलाकात की थी। बाद में मुझे कुआलालंपुर स्थित उनके निवास पर उनसे मिलने
का सौभाग्य प्राप्त हुआ। उन्होंने My Odyssey – Revolutionary & Evolutionary शीर्षक से एक पुस्तक लिखीहै, जिसकी एक प्रति अब मेरे पास है।

मुझे उन्हें अपनी एक उत्तराखंडी टोपी भेंट करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।उनके अनुसार, “बालक सेना केवल दस से पंद्रह वर्ष के भारतीय लड़कों के लिए थी। तीन महीने के आवासीयप्रशिक्षण में उन्हें बुनियादी सैन्य प्रशिक्षण दिया जाता था, हिंदी भाषा सिखाई जाती थी और उनमें देशभक्ति तथाभारत को ब्रिटिश शासन से मुक्त कराने का उद्देश्य जगाया जाता था। मैं जब मात्र बारह या तेरह वर्ष का था, तभीबालक सेना का सदस्य बना।”

पेनांग फ्री स्कूल में उनके शिक्षक मैथ्यूज़ ने उनकी क्षमता को पहचाना और उन्हें बालक सेना में शामिल होने के
लिए प्रेरित किया। उन्होंने सहर्ष सहमति दी और 1944 में उसी विद्यालय परिसर में अन्य आईएनए स्वयंसेवकों
के साथ प्रशिक्षण प्राप्त किया।

एक ‘पासिंग-आउट परेड’ में, जिसे नेताजी ने संबोधित किया, बालक सेना के प्रशिक्षु भी उपस्थित थे। उत्कृष्ट
प्रदर्शन के कारण राजाराव को नेताजी ने माला पहनाकर सम्मानित किया। वे लिखते हैं: “मैंने अपनी राइफल के
साथ सधे हुए अंदाज़ में सलामी दी और नारा लगाया—‘नेताजी की जय, इंकलाब ज़िंदाबाद, भारत माता की
जय, चलो दिल्ली।’ आश्चर्यजनक रूप से, सभी सैनिकों और बालक सेना के सदस्यों ने मेरे बाद प्रत्येक नारा
दोहराया।” वह क्षण उनके लिए अत्यंत प्रेरणादायक और उत्साहवर्धक था।

कल्पना की जा सकती है कि इन युवा बालक सेना के सदस्यों, आईएनए के स्वयंसेवकों और रानी झांसी रेजिमेंट
की महिलाओं में राष्ट्रवाद की कितनी प्रबल भावना रही होगी। उनमें से अनेक ने भारत को केवल रीति-रिवाजों,
परंपराओं और माता-पिता तथा दादा-दादी से सुनी कहानियों के माध्यम से ही जाना था, वह भी दूर देशों में
रहते हुए।

विदेश में रहकर भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ने की उनकी प्रेरणा अवश्य ही गहरी सांस्कृतिक जड़ों, सशक्त
पारिवारिक संरचना और स्थायी सामाजिक मूल्यों से शक्ति प्राप्त करती रही होगी।

लेखक एक समाजशास्त्री हैं और जेएनयू के पूर्व छात्र हैं। उनके शोध कार्य का उल्लेख नोबेल पुरस्कार विजेता
प्रोफेसर अमर्त्य सेन की पुस्तकों में भी किया गया है।

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