मोदी-जिनपिंग-पुतिन की तिकड़ी पर दुनिया की नजर

बीजिंग: चीन के तियानजिन में रविवार से दो दिवसीय शंघाई सहयोग संगठन (SCO) शिखर सम्मेलन शुरू हो रहा है, जिसमें चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग, भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और रूसी नेता व्लादिमीर पुतिन समेत दूसरे नेताओं की मेजबानी करने वाले हैं।

इस शिखर सम्मेलन को भारत और चीन के खिलाफ अमेरिका के छेड़े गए टैरिफ युद्ध के खिलाफ शक्ति प्रदर्शन के रूप में देखा जा रहा है, जिसमें दुनिया के चार शक्तिशाली नेताओं में से तीन एक ही मंच पर जुटने वाले हैं। रॉयटर्स ने अपनी रिपोर्ट में बताया था कि जिनपिंग प्रधानमंत्री मोदी और पुतिन का व्यक्तिगत रूप से स्वागत करेंगे।

भारतीय प्रधानमंत्री सात साल बाद चीन की यात्रा पर हैं। इसके पहले उन्होंने साल 2018 में चीन का दौरा किया था। ऐसे में यह यात्रा 2020 में गलवान घाटी में हुई सैन्य झड़पों के बाद भारत और चीन के बीच बिगड़े संबंधों को फिर से सुधारने की दिशा में एक और कदम है।

एससीओ की बैठक ऐसे में हो रही है, जब अमेरिकी राष्ट्रपति ने कई देशों के खिलाफ टैरिफ युद्ध छेड़ रखा है, जिसमें भारत भी शामिल है। ट्रंप ने नई दिल्ली पर 50% टैरिफ लगाया है। इसके अलावा रूस के खिलाफ कई प्रतिबंध लगाए गए हैं, जबकि चीन पर 200% टैरिफ का खतरा मंडरा रहा है। ट्रंप ने चेतावनी दी है कि अगर बीजिंग दुर्लभ मृदा चुंबक के निर्यात पर प्रतिबंध लगाता है, तो अमेरिका उसके उत्पादों पर 200% टैरिफ लगा देगा।

अमेरिका के टैरिफ युद्ध के बीच एससीओ वैश्विक शक्ति संतुलन के अभियान के लिए महत्वपूर्ण हो गया है, जिसका अमेरिका हमेशा से विरोध करता रहा है। चीनी अधिकारियों ने तियानजिन सम्मलेन को एससीओ का अब तक का सबसे बड़ा शिखर सम्मेलन बताया है। जिनपिंग इसे भुनाना चाह रहे हैं और भारत व रूस के साथ रिश्तों को मजबूत करने के लिए अवसर के तौर पर देख रहे हैं। खासतौर पर जब अमेरिका दुनियाभर में गठबंधनों को हिला रहा है।

यह सम्मेलन पुतिन के लिए भी खास है। इस दौरान वे चीन और भारत के साथ मंच साझा करेंगे, रूसी तेल के दो सबसे बड़े ग्राहक हैं। रूसी कच्चे तेल की खरीद को लेकर भारत पर 25% का अतिरिक्त टैरिफ लगाया गया है, जबकि चीन पर ऐसा कोई शुल्क नहीं लगाया गया है। भारत ने रूसी तेल खरीद बंद करने के दबाव का विरोध किया है और इसे अनुचित और अतार्कित बताया है।

एससीओ शिखर सम्मेलन में चीन, रूस, भारत, ईरान, पाकिस्तान, बेलारूस, कजाकिस्तान, किर्गिस्तान, ताजिकिस्तान और उज्बेकिस्तान शामिल हैं। ये देश वैश्विक आबादी के लगभग 40% हिस्से का प्रतिनिधित्व करते हैं और दुनिया के ऊर्जा संसाधनों के बड़े हिस्से को नियंत्रित करते हैं।

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