ग्लेशियरों के पिघलने से बन सकती हैं 56,000 नई झीलें

इस्लामाबाद: दुनिया में 200,000 से 275,000 ग्लेशियर हैं, जिनमें कुल पानी का 69 फीसदी जमा है। ये ऑस्ट्रेलिया के अलावा हर महाद्वीप पर हैं। ये आर्कटिक, अलास्का, अंटार्कटिका के साथ-साथ हिमालय और एंडीज जैसी पर्वत श्रृंखलाओं में बड़ी संख्या में मौजूद हैं। ये ग्लेशियर जलवायु परिवर्तन के कारण पिघलकर एशिया समेत दुनिया के बड़े हिस्से के लिए खतरे का सबब बन सकते हैं। वैज्ञानिकों ने इसको लेकर चेतावनी दी है।

नेचर कम्युनिकेशंस में प्रकाशित एक अध्ययन में स्वीडन, अमेरिका, स्विट्जरलैंड और नॉर्वे के शोधकर्ताओं ने ग्रह पर मौजूद सभी ग्लेशियरों के नीचे की जमीन का नक्शा बनाया और चौंकाने वाले नतीजे पर पहुंचे। उन्होंने बताया कि जब इस बर्फ का कुछ हिस्सा गायब हो जाएगा तो पृथ्वी पर 56,659 नई झीलें बनेंगी, जो अभी पूरी तरह से जमी हुई हैं।

स्वीडन की उप्साला यूनिवर्सिटी, अमेरिका की कार्नेगी मेलन यूनिवर्सिटी, स्विट्जरलैंड की यूनिवर्सिटी ऑफ लॉजेन और नॉर्वे की यूनिवर्सिटी ऑफ ओस्लो के शोधकर्ताओं की टीम ने ग्रीनलैंड और अंटार्कटिका की बड़ी बर्फ की चादरों के बाहर मौजूद ग्लेशियरों का विश्लेषण किया है। उन्होंने GPU और डीप लर्निंग से चलने वाले ‘इंस्ट्रक्टेड ग्लेशियर मॉडल’ नाम के थ्री-डायमेंशनल आइस फ्लो मॉडल का इस्तेमाल करके ग्लेशियरों के नीचे की जमीन की बनावट का पता लगाया।

इस विश्लेषण का मकसद यह समझना था कि अगर ग्लेशियर पूरी तरह से गायब हो जाएंगे तो पृथ्वी की सतह कैसी दिखेगी। यह प्रक्रिया जटिल थी क्योंकि ग्लेशियरों का आधार सीधे दिखाई नहीं देता है और इसके नीचे गहरी घाटियां, गड्ढे, प्राकृतिक बेसिन और ऐसे क्षेत्र छिपे हो सकते हैं, जहां पिघला हुआ पानी जमा हो सकता है।

इस स्टडी का मुख्य नतीजा यह था कि भविष्य में 56,659 ऐसी झीलें बन सकती हैं, जिनका कम से कम एरिया 0.05 वर्ग किलोमीटर होगा। ये भविष्य की झीलें 40,647 वर्ग किलोमीटर जगह घेर सकती हैं और इनमें 3,138 घन किलोमीटर तक पानी जमा हो सकता है। यह मात्रा समुद्र के जलस्तर में 7 मिलीमीटर की बढ़ोतरी के बराबर है, जो सीधे महासागरों में बहने के बजाय इन प्राकृतिक जलाशयों में कुछ समय के लिए जमा रहेगा।

इसका मतलब है कि बर्फ से मुक्त होने वाली नई जमीन का 6% हिस्सा झीलों से ढका हो सकता है। स्टडी में इस संख्या की तुलना उन इलाकों में झीलों के कवरेज के ग्लोबल औसत से की गई है, जहां ग्लेशियर नहीं हैं। यह औसत लगभग 2 प्रतिशत है। एशिया के पहाड़ी इलाके चिंता का सबब हैं। स्टडी में ऊंचे पहाड़ी एशियाई इलाके को संवेदनशील माना गया है। इसमें हिमालय, काराकोरम, हिंदू कुश, पामीर और तिएन शान पर्वत श्रृंखलाएं हैं।

रिसर्चर्स ने एशियाई इलाके में ग्लेशियर के किनारों के पास बड़े गड्ढे देखे। यह इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि ग्लेशियर के सबसे निचले हिस्से के पास बनने वाली झीलें ज्यादा पानी जमा कर सकती हैं। ये आबादी वाली घाटियों, सड़कों, पनबिजली संयंत्रों, खेती वाले इलाकों और गांवों के करीब हो सकती हैं।

हाई माउंटेन एशिया में ग्लेशियर के किनारों के बड़े गड्ढे इसका संकेत हैं कि ग्लेशियर की झील फटने से अचानक बाढ़ आने का खतरा है। इस घटना को अंग्रेजी में GLOF कहा जाता है। ये तब होती हैं, जब ग्लेशियर की झील खाली हो जाती है और घाटी में बड़ी मात्रा में पानी, बर्फ और तलछट बहने लगती है।

रिसर्च में बताया गया है कि दुनिया में खतरे की चपेट में आने वाली आधी से ज्यादा आबादी सिर्फ चार देशों में है। ये देश- भारत, पाकिस्तान, पेरू और चीन हैं। करीब 1.5 करोड़ लोग ग्लेशियर झीलों से अचानक आने वाली बाढ़ के संभावित असर के दायरे में हैं। स्टडी में हाई माउंटेन एशिया को उस इलाके के तौर पर पहचाना गया, जहां सबसे ज्यादा लोग खतरे में हैं।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *