बंगालः शुभेंदु अधिकारी बने मुख्यमंत्री

कोलकाता : पश्चिम बंगाल में शुभेंदु अधिकारी ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ले ली, इसी के साथ बंगाल में इतिहास बन गया है। बीजेपी पहली बार सत्ता में आई है। हालांकि अब शुभेंदु अधिकारी के सामने असली पांच चुनौतियां होंगी। बंगाल चुनाव में परिवर्तन का दावा कर सत्ता में आई बीजेपी के पास अब परफॉर्मेंस का दबाव होगा। केंद्र और राज्य, दोनों में एक ही राजनीतिक गठबंधन की सरकार होने से, इंफ्रास्ट्रक्चर सुधारने, निवेश आकर्षित करने और रोज़गार पैदा करने का एक मौका है। लेकिन उम्मीदें बहुत ज्यादा हैं। खास बात है कि बंगाल में सबसे बड़ा मुद्दा कानून-व्यवस्था का है, इसे लागू करना सबसे बड़ी टेढ़ी खीर होगा।

पश्चिम बंगाल की आबादी लगभग दस करोड़ से ज्यादा है। बंगाल में लगभग छह करोड़ वोटर हैं। 2021 विधानसभा चुनाव की बात करें तो BJP को 28.9 प्रतिशत वोट मिले थे। TMC ने 55 प्रतिशत से ज़्यादा वोटों के साथ आसानी से जीत हासिल की थी। इस बार, BJP का वोट शेयर बढ़कर 31.9 प्रतिशत हो गया, जबकि TMC का वोट शेयर गिरकर 26 प्रतिशत रह गया। अब बीजेपी को जिन 32 फीसदी बंगाल के लोगों ने चुना है उनकी शुभेंदु अधिकारी से बड़ी-बड़ी अपेक्षाएं हैं।

कुछ चुनौतियां ऐसी हैं जो तुरंत हल करने वाली हैं। कई चुनौतियां लंबे समय की हैं, लेकिन सबसे पहली चुनौती है अपराधियों पर सख़्त कार्रवाई करना और राज्य में क़ानून-व्यवस्था की स्थिति को बहाल करना। इसमें पूरे सिंडिकेट को ख़त्म करना भी शामिल है। केंद्र की जो परियोजनाएं अधूरी पड़ी हैं, उन्हें पूरा करना। और ऐसा माहौल बनाना जिससे राज्य की जो छवि बुरी तरह से ख़राब हो गई थी, वह सुधर सके और लोग सुरक्षित रूप से निवेश कर सकें।

बीजेपी सरकार के आगे सबसे बड़ी चुनौती कानून-व्यवस्था को ठीक से लागू करने की होगी। बंगाल में चुनाव से पहले और चुनाव के बाद हिंसा का इतिहास रहा है। अभी भी दो दिन पहले शुभेंदु अधिकारी के पी की हत्या कर दी गई। लगातार बीजेपी नेताओं को निशाने पर लिया गया। बंगाल में हत्या की वारदात आम हो गई है। रेप और महिला अपराध को लेकर बंगाल पहले से ही निशाने पर रहा है। ममता बनर्जी सरकार पर लॉ एंड ऑर्डर ठीक से लागू न करने के आरोप लगते रहे हैं।

पश्चिम बंगाल का राजनीतिक हिंसा का इतिहास काफ़ी पुराना रहा है। आगज़नी, पार्टी कार्यकर्ताओं पर हमले और डराने-धमकाने जैसी घटनाएं बार-बार सामने आती रही हैं। नई सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि ऐसी घटनाएं अब और न हों। पार्टी के भीतर इस संबंध में एक कड़ा संदेश पहले ही दे दिया गया है, लेकिन इसका ज़मीनी स्तर पर पालन करवाना ही सबसे बड़ी चुनौती होगी।

BJP के वादों में पुरानी और मज़बूत ‘सिंडिकेट व्यवस्था’ को खत्म करना, ‘सिंगल-विंडो क्लीयरेंस सिस्टम’ शुरू करना, और बंदरगाहों के ज़रिए विकास तथा ‘ब्लू इकॉनमी’ को बढ़ावा देना शामिल था। आधुनिक स्टील प्लांट बनाना, औद्योगिक पार्क स्थापित करना (जिसमें सिंगूर भी शामिल है), और पूरे राज्य में कई औद्योगिक ज़ोन बनाना भी इन वादों का हिस्सा था। हालांकि, कुछ इंफ्रास्ट्रक्चर चुनौतियां अब भी बनी हुई हैं, खासकर ज़मीन अधिग्रहण को लेकर। बंगाल में ज्यादा आबादी घनत्व और ज़मीन के छोटे-छोटे टुकड़ों में बंटे होने की वजह से, जमीन के बड़े-बड़े हिस्से हासिल करना अब भी एक संवेदनशील और जटिल काम है।

पश्चिम बंगाल में मुस्लिम आबादी लगभग 33% है। हाल ही में हिंदू वोटों का एक साथ आना और घुसपैठियों को लेकर चल रही बयानबाजी से संभावित सांप्रदायिक तनाव की आशंकाएं बढ़ गई हैं। इस बात का डर है कि भविष्य में असम की तरह नागरिकता सत्यापन जैसे मुद्दे यहां भी उठ सकते हैं। अगर इन मुद्दों को ठीक से नहीं संभाला गया, तो कानून-व्यवस्था की समस्याएं खड़ी हो सकती हैं।

हालांकि बीजेपी के घोषणा पत्र जारी करते हुए अमित शाह ने कहा था कि बीजेपी सरकार आई तो बंगाल में अवैध घुसपैठ रोकी जाएगी। बांग्लादेश बॉर्डर पर बाड़ लगाई जाएगी ताकि अवैध घुसपैठ पर रोक लगाई जा सके। भारत- बांग्लादेशकी 4096 किलोमीटर का बॉर्डर शेयर करता है। इसमें पश्चिम बंगाल में 2216.7 किमी एरिया आता है। पूरी तरह से खुले इतने बड़े एरिया की फेंसिंग करना आसान नहीं होगा।

BJP ने अक्सर बंगाल में उद्योगों के पतन की आलोचना की है। अब उसे अपने वादे को पूरा करके दिखाना होगा। केंद्र और राज्य, दोनों जगहों पर एक ही राजनीतिक दल की सरकार होने से, बुनियादी ढांचे को बेहतर बनाने, निवेश आकर्षित करने और रोज़गार के अवसर पैदा करने का एक सुनहरा मौका मिला है। लेकिन लोगों की उम्मीदें बहुत ज़्यादा हैं, और सरकार के नतीजों पर सबकी पैनी नज़र रहेगी। प्रधानमंत्री ने संकेत दिया है कि पहली कैबिनेट बैठक में ही ‘आयुष्मान भारत योजना’ को मंज़ूरी दे दी जाएगी।

इस योजना को राज्य की मौजूदा योजनाओं, जैसे ‘स्वास्थ्य साथी’, के साथ प्रभावी ढंग से जोड़ना बेहद ज़रूरी होगा। केवल घोषणा कर देना ही काफी नहीं होगा। इसका सही ढंग से क्रियान्वयन ही सरकार की विश्वसनीयता तय करेगा। प्रशासनिक कमियों को दूर करना और एक ऐसी नौकरशाही तैयार करना जो विकास कार्यों को समर्पित हो, बेहद ज़रूरी है। कैबिनेट के गठन में सदस्यों की योग्यता और उनके उद्देश्यों की स्पष्टता साफ़ तौर पर झलकनी चाहिए।

इसके अलावा, एक और बेहद ज़रूरी मुद्दा है राज्य सरकार के कर्मचारियों का रुका हुआ ‘महंगाई भत्ता’ पिछली सरकार इन मांगों को पूरी तरह से पूरा करने में नाकाम रही थी, और BJP ने वादा किया था कि वह सत्ता में आने पर इन मुद्दों को ज़रूर सुलझाएगी। हालांकि, मौजूदा वित्तीय बाधाओं को देखते हुए, इस वादे को पूरा करना एक बड़ी चुनौती होगी। सवाल अब भी यही है कि सरकार अपनी प्रतिबद्धताओं को पूरा करते हुए वित्तीय बोझ को कैसे संभालेगी? बंगाल में बीजेपी ने तमाम ऐसे वादे किए हैं जिससे राज्य पर वित्तीय बोझ काफी बढ़ जाएगा।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *