ढाका/बीजिंग: बीजिंग में बांग्लादेश के प्रधानमंत्री तारिक रहमान ने रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण मोंगला पोर्ट को चीन के हवाले कर दिया है। करीब एक दशक पहले मोंगला पोर्ट को लेकर ढाका ने भारत के साथ डील की थी जिसे तोड़ दिया गया है। इस प्रोजेक्ट के लिए तय जमीन अब चीन को आवंटित कर दी गई है। बांग्लादेश के प्रधानमंत्री तारिक रहमान की बीजिंग की पहली राजकीय यात्रा के दौरान ये डील की गई है।
बांग्लादेश ने देश के दूसरे सबसे बड़े बंदरगाह से सटे ‘चीन-बांग्लादेश मोंगला पोर्ट इकोनॉमिक जोन’ को विकसित करने के लिए ‘चाइना सिविल इंजीनियरिंग कंस्ट्रक्शन कॉर्पोरेशन’ के साथ एक MoU पर हस्ताक्षर किए हैं। बिजनेस स्टैंडर्ड की रिपोर्ट के मुताबिक बुधवार को जब बांग्लादेश इकोनॉमिक ज़ोन अथॉरिटी (BEZA) ने MoU पर साइन किए तो प्रधानमंत्री तारिक रहमान वहां मौजूद थे।बांग्लादेश ने प्रोजेक्ट के काम में हो रही देरी का हवाला देकर भारत के साथ समझौता खत्म किया था। लेकिन हकीकत ये है कि भारतीय कंपनी को कई वर्ष तक जमीन ही नहीं दी गई तो फिर परियोजना पर काम कैसे शुरू हो पाता।
भारत ने 2015 में मोंगला में एक आर्थिक क्षेत्र विकसित करने के लिए समझौता किया था। 2018 में भारतीय कंपनी हीरानंदानी समूह को इस प्रोजेक्ट के लिए चुना गया था लेकिन कई वर्षों तक बांग्लादेश की सरकार ने भारतीय कंपनी को जमीन नहीं दी।शेख हसीना की सरकार गिरने के बाद मोहम्मद यूनुस की नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार ने अपनी विदेश और आर्थिक नीतियों में बदलाव किया। नई सरकार ने भारत पर आर्थिक निर्भरता कम करने की रणनीति के तहत चीन से हाथ मिला लिया।मोंगला बंदरगाह भारतीय सीमा, सुंदरबन तट से लगभग 80-100 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। भारत की सुरक्षा एजेंसियों को चिंता है कि बंगाल की खाड़ी में इस क्षेत्र का चीन के हाथों में जाना भारत की तटीय सुरक्षा और नौसैनिक गतिविधियों की निगरानी के लिए एक बड़ा जोखिम हो सकता है।
रियर एडमिरल आरिफ अहमद मुस्तफा ने इस महीने की शुरुआत में मोंगला पोर्ट अथॉरिटी के नए चेयरमैन का पद संभाला है। इसके बाद MoU पर हस्ताक्षर किए गए।चटगांव के बाद बांग्लादेश का दूसरा सबसे बड़ा और दूसरा सबसे व्यस्त बंदरगाह मोंगला पोर्ट है। यह कोलकाता से 200 किलोमीटर से भी कम दूरी पर है और रणनीतिक रूप से सुंदरबन के पास स्थित है।2018 से बांग्लादेश ने भारतीय कार्गो को मोंगला और चटगांव दोनों बंदरगाहों का इस्तेमाल करने की इजाजत दे रखी है। इससे नई दिल्ली को अपने उन पूर्वोत्तर राज्यों तक जल्द पहुंचने का रास्ता मिलता है। हो सकता है कि आने वाले वक्त में चीन इस रास्ते में भारत के लिए परेशानी पैदा करे।
मोंगला पहल की शुरुआत 2015 में प्रधानमंत्री मोदी की ढाका यात्रा के दौरान हुई एक संयुक्त घोषणा से हुई थी। इस प्रोजेक्ट के तहत भारत ने ‘लाइन ऑफ क्रेडिट’ प्रोग्राम के जरिए बांग्लादेश में दो इकोनॉमिक जोन को मदद देने का वादा किया गया था। एक मोंगला में और दूसरा चटगांव के पास मीरसराय में।मार्च 2018 में भारत सरकार ने मोंगला इकोनॉमिक जोन के लिए जमीन विकसित करने के काम के लिए हीरानंदानी ग्रुप को चुना। मार्च 2022 में BEZA ने हीरानंदानी की सहायक कंपनी, एविटा कंस्ट्रक्शन्स के साथ एक MoU (समझौता ज्ञापन) पर हस्ताक्षर किए।लेकिन ‘बिजनेस स्टैंडर्ड’ की रिपोर्ट के मुताबिक BEZA अधिकारियों का कहना है कि हीरानंदानी ग्रुप ने दो साल के भीतर निर्माण कार्य शुरू नहीं किया इसलिए इस प्रोजेक्ट को लिस्ट से हटा दिया गया।
2019 में भारत ने इस प्रोजेक्ट को मदद देने के लिए अपनी ‘लाइन ऑफ क्रेडिट’ से 115 मिलियन डॉलर की राशि दी। BEZA ने अडानी पोर्ट्स के साथ भी एक समझौता किया था लेकिन वह प्रोजेक्ट आगे नहीं बढ़ पाया।यह पहली बार नहीं है जब भारत को दिया गया कोई प्रोजेक्ट चीन को सौंप दिया गया हो। फरवरी में बांग्लादेश ने चटगांव में SEZ (स्पेशल इकोनॉमिक ज़ोन) के लिए भारत को दी गई जमीन का आवंटन रद्द कर दिया और उसे ड्रोन बनाने की सुविधा स्थापित करने के लिए चीन को दे दिया। चीन को बांग्लादेश को ड्रोन तकनीक भी देनी थी।
बांग्लादेश 2016 में चीन की ‘बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव’ (BRI) में शामिल हुआ था और उसके ट्रांसपोर्ट, एनर्जी और इंडस्ट्रियल सेक्टर में चीनी निवेश लगातार बढ़ा है।चीन की क्षेत्रीय और वैश्विक महत्वाकांक्षाओं में बांग्लादेश रणनीतिक रूप से अहम जगह रखता है। हिंद महासागर के पूर्वी हिस्से में स्थित यह देश बीजिंग की BRI का एक अहम पार्टनर है। BRI राष्ट्रपति शी जिनपिंग का प्रमुख इंफ्रास्ट्रक्चर और कनेक्टिविटी प्रोग्राम है जिसका मकसद चीन के आर्थिक और भू-राजनीतिक प्रभाव को बढ़ाना है।
