नई दिल्ली: दुर्लभ मृदा यानी रेयर अर्थ को लेकर चीन काफी इतराता है। इसका कारण है कि दुनिया में जबरदस्त मांग वाली इस चीज पर फिलहाल चीन का एकाधिकार है। चीन रेयर अर्थ को दुनियाभर को बेचकर जबरदस्त कमाई कर रहा है। चीन के सामान्य सीमा शुल्क प्रशासन (GACC) की ओर से जारी डेटा के अनुसार अप्रैल 2026 में चीन का रेयर अर्थ निर्यात 64.2 मिलियन डॉलर (करीब 606 करोड़ रुपये) तक पहुंच गया है। एएनआई के मुताबिक इस दौरान चीन ने कुल 5,308.6 टन रेयर अर्थ का निर्यात किया।
अप्रैल महीने में चीन का कुल व्यापार 634.06 अरब डॉलर का रहा। देश के निर्यात में पिछले महीने की तुलना में 12 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है। कुल कितनी वृद्धि: GACC के अनुसार चीन के कुल व्यापार, निर्यात और आयात मूल्य में महीने-दर-महीने 7.2 प्रतिशत की वृद्धि देखी गई है।रेयर अर्थ का इस्तेमाल स्मार्टफोन, इलेक्ट्रिक वाहन और सैन्य उपकरणों जैसी हाई टेक वाली चीजों में किया जाता है। वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में चीन की मजबूत पकड़ को देखते हुए निर्यात की मात्रा में यह स्थिरता वैश्विक तकनीकी बाजार के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
कुछ समय पहले टैरिफ को लेकर अमेरिका और चीन आमने-सामने आ गए थे। इसके बाद चीन ने रेयर अर्थ का एक्सपोर्ट बंद कर दिया था। इससे इलेक्ट्रॉनिक और ऑटोमोबाइल समेत दुनिया में कई सेक्टर में हलचल मच गई थी। चीन ने भारत को भी रेयर अर्थ के लिए काफी इंतजार कराया था। इसके बाद भारत सरकार ने चीन पर निर्भरता कम करने के लिए हाल ही में कई बड़े फैसले लिए हैं:बजट 2026-27 में ओडिशा, केरल, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु में विशेष ‘रेयर अर्थ कॉरिडोर्स’ बनाने की घोषणा की गई है। ये कॉरिडोर खनन से लेकर प्रोसेसिंग तक का काम करेंगे।
नवंबर 2025 में सरकार ने 7,280 करोड़ रुपये की एक योजना को मंजूरी दी है ताकि भारत में ही दुर्लभ मृदा स्थायी चुंबकीय का निर्माण शुरू हो सके।बजट 2026 में मोनाजाइट पर मूल सीमा शुल्क को 2.5% से घटाकर शून्य कर दिया गया है ताकि घरेलू प्रोसेसिंग को बढ़ावा मिले।भारत का लक्ष्य साल 2030 तक रेयर अर्थ के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनना है, विशेषकर इलेक्ट्रिक वाहनों (EV), पवन ऊर्जा और रक्षा उपकरणों के लिए। वर्तमान में भारत अपनी जरूरत का 80 से 90% हिस्सा (विशेषकर मैग्नेट्स) चीन से आयात करता है, जिसे कम करने के लिए निजी क्षेत्र को भी अब इस क्षेत्र में खनन की अनुमति दी जा रही है।

