बिहार में ‘नीतीश युग’ का अंत

पटनाः बिहार की राजनीति में आज एक ऐतिहासिक अध्याय का समापन हो गया है. नीतीश कुमार ने मुख्यमंत्री पद से अपना इस्तीफा राज्यपाल को सौंप दिया. दशकों तक सत्ता के केंद्र में रहने वाले नीतीश के इस फैसले ने पूरे देश के सियासी गलियारों में हलचल पैदा कर दी है.

इस्तीफा देने के बाद उन्होंनेअपना पहला बयान जारी करते हुए कहा कि अब नई सरकार बिहार के काम को आगे बढ़ाएगी और उनका पूरा सहयोग और मार्गदर्शन नई व्यवस्था के साथ रहेगा. उन्होंने भावुक होते हुए कहा कि हमने बिहार की जनता के लिए बहुत काम किया है और उन्हें पूरा भरोसा है कि आने वाली सरकार भी राज्य के विकास के लिए अच्छा काम करती रहेगी. इस बड़े बदलाव के बाद अब चर्चा है कि बिहार में भाजपा का मुख्यमंत्री और जदयू से दो उपमुख्यमंत्री बन सकते हैं.

बिहार के इस सत्ता परिवर्तन के बीच एक नया नाम सबसे ज्यादा चर्चा में है और वह है नीतीश कुमार के बेटे निशांत कुमार का. जैसे ही नीतीश कुमार ने सक्रिय राजनीति से पीछे हटने के संकेत दिए तभी से यह सवाल उठने लगा कि क्या उनकी राजनीतिक विरासत अब निशांत कुमार संभालेंगे. हालांकि निशांत कुमार ने फिलहाल उपमुख्यमंत्री जैसे बड़े संवैधानिक पद से दूरी बनाकर सबको हैरान कर दिया है.

जदयू के कार्यकारी अध्यक्ष संजय झा के अनुसार निशांत कुमार अब पार्टी संगठन में काफी सक्रिय नजर आ रहे हैं और वे लगातार कार्यकर्ताओं से मिलकर सुझाव भी दे रहे हैं. जानकारों का मानना है कि निशांत कुमार फिलहाल किसी पद की लालसा के बजाय संगठन की जमीनी हकीकत को समझने पर ज्यादा ध्यान दे रहे हैं ताकि वे अपनी एक स्वतंत्र पहचान बना सकें.

निशांत कुमार द्वारा डिप्टी सीएम की कुर्सी ठुकराने के पीछे एक सोची-समझी राजनीतिक रणनीति मानी जा रही है ताकि उन पर ‘सीधी छलांग’ लगाने का आरोप न लगे. जदयू के अंदरूनी सूत्रों का कहना है कि वे नहीं चाहते कि उनकी पहचान सिर्फ एक मुख्यमंत्री के बेटे के तौर पर सिमटकर रह जाए बल्कि वे कार्यकर्ताओं के बीच अपनी स्वीकार्यता बनाना चाहते हैं.

खुद नीतीश कुमार भी यही मानते हैं कि राजनीति में टिकने के लिए अनुभव और समय बहुत जरूरी है इसलिए उन्होंने निशांत को पहले जनता के बीच जाने की सलाह दी है. इसके अलावा पार्टी को डर है कि अगर निशांत सीधे बड़े पद पर आते हैं तो विपक्षी दल इसे परिवारवाद और वंशवाद का मुद्दा बनाकर हमला तेज कर सकते हैं. इसी कारण फिलहाल उन्हें फ्रंटलाइन से थोड़ा पीछे रखकर संगठन को मजबूत करने की जिम्मेदारी दी गई है.

संजय झा के बयानों से यह संकेत भी मिले हैं कि निशांत कुमार जल्द ही पूरे बिहार का दौरा कर सकते हैं जिसे उनकी ‘सॉफ्ट लॉन्चिंग’ के तौर पर देखा जा रहा है. यह योजना जदयू के कोर वोट बैंक खासकर महिलाओं और गरीब तबके के बीच नीतीश कुमार की ‘न्याय के साथ विकास’ वाली छवि को आगे ले जाने की एक कोशिश है. एक तरफ जहां भाजपा अपना मुख्यमंत्री बनाने की तैयारी में जुटी है वहीं जदयू फिलहाल सत्ता के बजाय जनता से भावनात्मक जुड़ाव बनाने पर फोकस कर रही है.

हालांकि भविष्य में अगर कार्यकर्ताओं का दबाव बढ़ता है तो निशांत कुमार अपनी भूमिका को लेकर नया फैसला भी ले सकते हैं. फिलहाल निशांत का यह ‘इनकार’ बिहार की सियासत में चर्चा का सबसे बड़ा विषय बना हुआ है और सबकी निगाहें इस पर टिकी हैं कि आने वाले समय में वे राजनीति के किस पायदान पर नजर आते हैं.

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