भारतीय समाज में सामाजिक एकता

आज का विश्व एक ओर परस्पर जुड़ा हुआ और एक-दूसरे पर निर्भर है, तो दूसरी ओर गहरे विभाजनों और परस्पर विरोधी हितों से भी प्रभावित है। ऐसे समय में किसी राष्ट्र की शक्ति केवल उसकी आर्थिक प्रगति या राजनीतिक स्थिरता पर ही निर्भर नहीं करती, बल्कि इस बात पर भी निर्भर करती है कि उसके विविध समुदायों, सामाजिक समूहों और सांस्कृतिक परंपराओं के बीच संबंध कितने सुदृढ़ और सौहार्दपूर्ण हैं। भारत एक ऐसे अद्वितीय राष्ट्र का उदाहरण है, जो अनेक धर्मों, भाषाओं, संस्कृतियों और रीति-रिवाजों की विविधता से समृद्ध है। साथ ही, इसकी बहुप्रशंसित विविधता में एकता इसकी सबसे बड़ी शक्तियों में से एक होने के साथ-साथ सबसे संवेदनशील चुनौतियों में भी शामिल है।

सामाजिक विज्ञान की प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय पत्रिका इम्पैक्ट इंटरनेशनल में प्रकाशित एक लेख में यह टिप्पणी की गई थी कि औपनिवेशिक नीतियों ने भारतीय समाज में इतनी गहरी सामाजिक दरारें छोड़ दीं कि वह मानो एक ऐसे समयबम के समान प्रतीत होता है, जो कभी भी विस्फोट कर सकता है। आज भी अंतरराष्ट्रीय मीडिया समय-समय पर यह चिंता व्यक्त करता है कि सांप्रदायिक तनाव देश के भविष्य के लिए गंभीर चुनौती बन सकते हैं। किंतु इन आशंकाओं के समानांतर भारत की सह-अस्तित्व, पारस्परिक सहयोग और साझा नियति की सदियों पुरानी परंपरा भी विद्यमान है। यह परंपरा आज भी अपनी उल्लेखनीय दृढ़ता का परिचय देती है और इतनी कमजोर नहीं हुई है कि भारतीय समाज का ताना-बाना आसानी से बिखर जाए।

गहराई से देखने पर स्पष्ट होता है कि आज अनेक पूर्वी समाज उन चुनौतियों का सामना कर रहे हैं, जिनका सामना बीसवीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में पश्चिमी समाजों ने किया था। उस समय यूरोप के अनेक युवा धर्म से विमुख हो चुके थे, जबकि स्वार्थपरता और सामाजिक अलगाव समाज में गहराई तक पैठ बना चुके थे। समाज भावनात्मक अस्थिरता से ग्रस्त था, जहाँ छोटी-सी सफलता अत्यधिक उत्साह और अति-आत्मविश्वास का कारण बन जाती थी, जबकि मामूली असफलता लोगों को निराशा और मोहभंग की ओर धकेल देती थी। यही वह यूरोप था जिसने दो विश्वयुद्धों की विनाशलीला देखी।

उस दौर में अनेक प्रभावशाली विचारकों और नेताओं ने संकीर्ण राष्ट्रवाद के स्थान पर अंतरराष्ट्रीय सहयोग, मानव कल्याण, उदार दृष्टिकोण और समस्त मानवता के प्रति साझा उत्तरदायित्व की भावना को बढ़ावा देकर जनचेतना को नई दिशा प्रदान की। समय के साथ जो लोग कभी एक-दूसरे को शत्रु मानते थे और अपनी विफलताओं के लिए एक-दूसरे को दोषी ठहराते थे, वे घनिष्ठ सहयोगी बन गए। राष्ट्रीय सीमाओं का विभाजनकारी महत्व धीरे-धीरे कम होता गया, यहाँ तक कि आज एक ही वीज़ा के माध्यम से यूरोप के सत्ताईस देशों की यात्रा संभव है।

इसी प्रकार का परिवर्तन सदियों पहले सूफी विद्वानों, लेखकों और कवियों के प्रयासों से भी देखने को मिला था। उन्होंने फ़ारसी के उस कालजयी संदेश को लोकप्रिय बनाया—

आदम की संतानें एकदूसरे के अंग हैं,
क्योंकि वे एक ही मूल तत्व से उत्पन्न की गई हैं।

इस मानवीय दर्शन ने मध्यकालीन युग, जिसे प्रायः स्वर्णिम काल कहा जाता है, के उत्कर्ष में महत्वपूर्ण योगदान दिया। उसी काल में भारत सहित पूर्वी सभ्यताएँ असाधारण समृद्धि और वैभव की भूमि के रूप में विश्वविख्यात हुईं।

आज के विद्वानों और बुद्धिजीवियों के सामने भी उतनी ही महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है। ऐसे समय में जब समाजों में वैमनस्य और ध्रुवीकरण बढ़ रहा है तथा वैश्विक आर्थिक स्थिरता स्वयं अनिश्चितता के दौर से गुजर रही है, उन्हें नई पीढ़ी को वर्तमान परिस्थितियों की गंभीरता से अवगत कराना होगा। उन्हें समाज में जागरूकता उत्पन्न करनी होगी, नैतिक और बौद्धिक मार्गदर्शन प्रदान करना होगा तथा आंतरिक विभाजनों, वैचारिक विखंडन और साझा प्राथमिकताओं के अभाव को दूर करने में समाज का नेतृत्व करना होगा।

उन्हें लोगों को विभाजनकारी भेदों के बजाय साझा उद्देश्यों पर ध्यान केंद्रित करने के लिए प्रेरित करते हुए पूर्वाग्रह और अविश्वास की उन गांठों को खोलना होगा, जो सामूहिक शक्ति को कमजोर करती हैं। निस्संदेह, विविधता और सामाजिक भिन्नताएँ समाज का एक संवेदनशील पक्ष हैं, किंतु वे उसकी सबसे बड़ी शक्तियों में भी शामिल हैं। ऐसे समाज में संवाद, पारस्परिक सम्मान और सहयोग केवल वांछनीय मूल्य नहीं हैं, बल्कि शांति, विकास और राष्ट्रीय स्थिरता के लिए अनिवार्य आधार हैं।

विश्व की सबसे बड़ी युवा आबादी वाले देशों में से एक भारत अपनी युवा पीढ़ी की ओर आशा और विश्वास के साथ देखता है। किंतु घृणा, ध्रुवीकरण और भेदभाव का वातावरण अनेक प्रतिभाशाली युवाओं में विदेशों में अवसर तलाशने की बढ़ती इच्छा को भी जन्म दे रहा है। ठीक इसी समय यूरोप और उत्तरी अमेरिका के अनेक देश विश्वभर से उच्च शिक्षित और कुशल व्यक्तियों को अपने यहाँ बसने के लिए सक्रिय रूप से प्रोत्साहित कर रहे हैं। वे यह समझते हैं कि मानवीय प्रतिभा किसी भी राष्ट्र की सबसे बड़ी संपत्ति होती है तथा विविधता समाज को कमजोर नहीं, बल्कि अधिक सशक्त बनाती है।

ये समाज यह भी समझते हैं कि सामाजिक एकता केवल सरकारी नीतियों या आधिकारिक कार्यक्रमों के माध्यम से स्थापित नहीं की जा सकती। इसका निर्माण लोगों के बीच होने वाले दैनिक मानवीय संपर्कों से होता है—पड़ोसियों के बीच बातचीत, बच्चों का साथ खेलना, सार्वजनिक परिवहन का साझा उपयोग, स्थानीय कार्यक्रमों में भागीदारी और व्यक्तिगत संबंधों का विकास। जब लोग एक-दूसरे को व्यक्तिगत रूप से जानने लगते हैं, तो रूढ़ धारणाओं का प्रभाव धीरे-धीरे समाप्त होने लगता है और पारस्परिक विश्वास मजबूत होता है। इसके विपरीत, जो लोग धर्म, भाषा, नस्ल या जातीयता के आधार पर विभाजन उत्पन्न करके इस स्वाभाविक प्रक्रिया को बाधित करने का प्रयास करते हैं, वे वास्तव में समाज के हितों के विरुद्ध कार्य करते हैं और राष्ट्र को कमजोर करते हैं।

एक समय था जब पश्चिमी देशों में भारत को सपेरों, सड़क किनारे करतब दिखाने वालों, राजाओं और नवाबों की भूमि के रूप में देखा जाता था। किंतु आज भारतीय युवाओं की बुद्धिमत्ता, नवाचार क्षमता और अथक परिश्रम ही भारत की सबसे प्रमुख पहचान बन चुके हैं। यह परिवर्तन मुख्यतः दो महत्वपूर्ण कारणों से संभव हुआ। पहला, विद्वानों और विचारकों द्वारा प्रेरित बौद्धिक दृष्टिकोण में परिवर्तन; और दूसरा, लोगों के बीच बढ़ता संवाद, संपर्क और सहभागिता, जिसने विश्व को भारत और उसके लोगों को अधिक सही और गहराई से समझने का अवसर प्रदान किया।

सामाजिक विज्ञान के विशेषज्ञ निरंतर इस बात पर बल देते हैं कि सामाजिक एकता बार-बार होने वाले संवाद, संपर्क और सहयोग से सुदृढ़ होती है। जितना अधिक लोग अपने दैनिक जीवन में एक-दूसरे के साथ सकारात्मक रूप से जुड़ते हैं, उतने ही मजबूत सामाजिक एकजुटता के बंधन बनते हैं। विद्यालय, महाविद्यालय और विश्वविद्यालय भावी पीढ़ियों के दृष्टिकोण और मूल्यों के निर्माण में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। ये संस्थान विभिन्न सामाजिक, सांस्कृतिक और धार्मिक पृष्ठभूमियों से आने वाले विद्यार्थियों को एक साथ लाते हैं, जिससे ऐसा वातावरण निर्मित होता है जहाँ वे केवल शैक्षिक ज्ञान ही प्राप्त नहीं करते, बल्कि शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व, सहिष्णुता और पारस्परिक सम्मान के सिद्धांत भी सीखते हैं। संवाद, टीमवर्क और सहयोगात्मक शिक्षण को प्रोत्साहित करने वाली कक्षाएँ विद्यार्थियों को विभिन्न दृष्टिकोणों का सम्मान करना सिखाती हैं। सांस्कृतिक उत्सव, वाद-विवाद प्रतियोगिताएँ, खेलकूद तथा सामुदायिक सेवा गतिविधियाँ विभिन्न समुदायों से जुड़े विद्यार्थियों के बीच संबंधों को और अधिक सुदृढ़ बनाती हैं।

समावेशी मूल्यों को बढ़ावा देने की सबसे बड़ी जिम्मेदारी शायद शिक्षकों के कंधों पर होती है। संवैधानिक मूल्यों, मानवीय गरिमा, नागरिक नैतिकता तथा विविधता के सम्मान पर बल देकर वे विद्यार्थियों को पूर्वाग्रहों से ऊपर उठने और बहुलतावाद की समृद्धि को समझने में सहायता कर सकते हैं। इसलिए शिक्षा का उद्देश्य केवल बौद्धिक उत्कृष्टता प्राप्त करना ही नहीं होना चाहिए, बल्कि सामाजिक उत्तरदायित्व, सहानुभूति और नैतिक नागरिकता की भावना का भी विकास करना होना चाहिए। इसी प्रकार, कार्यस्थल भी सामाजिक एकता को सुदृढ़ करने के महत्वपूर्ण अवसर प्रदान करते हैं। विभिन्न समुदायों के कर्मचारी समान उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए मिलकर कार्य करते हैं, जिससे सहयोग और पारस्परिक समझ का वातावरण विकसित होता है। व्यावसायिक सहयोग प्रायः सामाजिक और सांस्कृतिक भेदों से ऊपर उठ जाता है तथा यह सिद्ध करता है कि अंततः योग्यता, ईमानदारी और प्रतिबद्धता, पहचान-आधारित भेदों से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हैं।

जिस प्रकार माँ की गोद बच्चे की पहली पाठशाला होती है, उसी प्रकार गाँव और मोहल्ले सामाजिक जीवन की पहली संस्थाएँ होते हैं। सामुदायिक स्वच्छता अभियान, सांस्कृतिक कार्यक्रम, खेलकूद गतिविधियाँ और पड़ोस की बैठकें सामूहिक उत्तरदायित्व की भावना को विकसित करती हैं। जब लोग स्वच्छता, शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं या पर्यावरण संरक्षण जैसी साझा चुनौतियों का समाधान करने के लिए मिलकर कार्य करते हैं, तब उनके साझा हित उन्हें उनके मतभेदों के बावजूद एक सूत्र में बाँध देते हैं। सशक्त पड़ोस विश्वास और सहयोग की भावना को विकसित करते हैं, संकट के समय समुदायों को अधिक सक्षम और लचीला बनाते हैं तथा शांतिपूर्ण ढंग से विवादों का समाधान करने की उनकी क्षमता को बढ़ाते हैं।

सामाजिक एकता के मार्ग में सबसे बड़ी बाधा पूर्वाग्रह है। ऐसे पूर्वाग्रह प्रायः अज्ञानता, भ्रामक सूचनाओं, ऐतिहासिक शिकायतों या भिन्न पृष्ठभूमियों के लोगों के साथ सीमित संपर्क के कारण उत्पन्न होते हैं। इन बाधाओं को दूर करने के लिए व्यक्तिगत तथा संस्थागत—दोनों स्तरों पर सचेत प्रयास आवश्यक हैं। मीडिया संस्थानों, शैक्षणिक संस्थाओं, धार्मिक नेताओं और नागरिक समाज संगठनों को मिलकर सही जानकारी का प्रसार करना चाहिए, रचनात्मक संवाद को प्रोत्साहित करना चाहिए तथा विविधता के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण विकसित करना चाहिए।

पारस्परिक सम्मान सामाजिक सद्भाव का एक और अनिवार्य स्तंभ है। सम्मान का अर्थ यह नहीं है कि प्रत्येक व्यक्ति हर विषय पर एक-दूसरे से सहमत हो; बल्कि इसका अर्थ है प्रत्येक व्यक्ति की गरिमा और मानवता को स्वीकार करना। जब समुदाय एक-दूसरे की आस्थाओं, विचारों और सांस्कृतिक परंपराओं का सम्मान करते हैं, तब भिन्नता और विविधता विभाजन का कारण बनने के बजाय समृद्धि और शक्ति का स्रोत बन जाती हैं।

विश्वास ऊपर से थोपा नहीं जा सकता; वह समाज के भीतर से विकसित होता है। यह न्याय, पारदर्शिता, संवाद और निरंतर सकारात्मक अनुभवों के माध्यम से धीरे-धीरे निर्मित होता है। जो समुदाय ईमानदारी और निष्कपटता के साथ एक-दूसरे से जुड़ते हैं, वे गलतफहमियों को दूर करने और स्थायी संबंध स्थापित करने में अधिक सक्षम होते हैं। भारत सहित विश्व के अनेक देशों में असंख्य उदाहरण यह सिद्ध करते हैं कि विभिन्न समुदायों के बीच सहयोग की शक्ति कितनी प्रभावशाली होती है। बाढ़, भूकंप और महामारी जैसी प्राकृतिक आपदाओं के दौरान लोग धर्म, जाति, नस्ल या सामाजिक पहचान की परवाह किए बिना एक-दूसरे की सहायता और राहत के लिए आगे आते हैं।

वास्तव में, एक सच्चा समरस समाज वही है जहाँ विविधता को सकारात्मक मूल्य के रूप में स्वीकार किया जाता है, मतभेदों का सम्मान किया जाता है, साझा खुशियों का मिलकर उत्सव मनाया जाता है और प्रत्येक व्यक्ति—चाहे उसकी जाति, धर्म, भाषा या पृष्ठभूमि कोई भी हो—एक बड़े मानवीय परिवार का समान एवं सम्मानित सदस्य माना जाता है।

दृष्टिकोण –अबू अब्दुल्ला अहमद

 

 

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