गौरवशाली विरासत के प्रतीक

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु द्वारा रक्षा अलंकरण समारोह–2026 के दौरान देश के वीरता पुरस्कार प्रदान किए गए। ये सम्मान उन असाधारण साहसिक कार्यों के लिए दिए गए जिन्हें हमारे सैनिकों और सुरक्षा बलों के जवानों ने देश के सबसे चुनौतीपूर्ण और जोखिमपूर्ण अभियानों में प्रदर्शित किया। प्रत्येक प्रशस्ति-पत्र के पीछे कर्तव्य, बलिदान और मातृभूमि के प्रति अटूट समर्पण की प्रेरणादायक कहानी निहित है। सम्मानित वीरों में अनेक मुस्लिम अधिकारी एवं जवान भी शामिल थे, जिनकी अदम्य वीरता इस सत्य को पुनः स्थापित करती है कि राष्ट्र की रक्षा प्रत्येक भारतीय की साझा जिम्मेदारी है, जिसे धर्म, भाषा और क्षेत्र से ऊपर उठकर निभाया जाता है।

विशेष रूप से असम राइफल्स के सहायक कमांडेंट (वर्तमान में उप कमांडेंट) मोहम्मद शफीक, केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (सीआरपीएफ) के कांस्टेबल सद्दाम हुसैन, भारतीय वायुसेना के स्क्वाड्रन लीडर रिजवान मलिक तथा मरणोपरांत वीर चक्र से सम्मानित उप-निरीक्षक मोहम्मद इम्तेयाज को प्रदान किए गए सम्मान उल्लेखनीय हैं। इनके साथ कांस्टेबल फेदा हुसैन डार भी उस अभियान का हिस्सा थे, जिसे असाधारण वीरता के लिए सम्मानित किया गया। इन सभी की गाथाएँ केवल व्यक्तिगत साहस की कहानियाँ नहीं हैं, बल्कि भारत की सुरक्षा व्यवस्था के उस व्यापक इतिहास का हिस्सा हैं, जहाँ वर्दी हर अन्य पहचान से ऊपर होती है।

2 नवंबर 2024 को संचालित एक महत्वपूर्ण अभियान में कांस्टेबल संजय तिवारी और फेदा हुसैन डार ने अत्यंत कठिन परिस्थितियों में अद्वितीय साहस, संयम और पेशेवर दक्षता का परिचय दिया। इस अभियान के लिए उन्हें शौर्य चक्र से सम्मानित किया गया। इसके कुछ ही दिनों बाद, 5 नवंबर 2024 को असम राइफल्स के सहायक कमांडेंट मोहम्मद शफीक तथा सीआरपीएफ के कांस्टेबल सद्दाम हुसैन को भी उनके उत्कृष्ट साहस और कर्तव्यनिष्ठा के लिए सम्मानित किया गया। उनके कार्य भारतीय सुरक्षा बलों की सर्वोच्च परंपराओं—नेतृत्व, संकट की घड़ी में धैर्य तथा मिशन के प्रति अटूट प्रतिबद्धता—का उत्कृष्ट उदाहरण हैं।

असम राइफल्स के अधिकारी मोहम्मद शफीक का नेतृत्व और विपरीत परिस्थितियों में उनका संतुलित आचरण भारतीय सुरक्षा बलों की गौरवशाली परंपरा को प्रतिबिंबित करता है। इसी प्रकार कांस्टेबल सद्दाम हुसैन ने अत्यंत चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों में जिस साहस और कर्तव्यपरायणता का परिचय दिया, वह उन हजारों सुरक्षा कर्मियों की भूमिका को रेखांकित करता है जो सार्वजनिक चर्चा से दूर रहकर भी राष्ट्र की सुरक्षा व्यवस्था की आधारशिला बने हुए हैं।

आकाश में अपने अदम्य साहस का परिचय देते हुए भारतीय वायुसेना के स्क्वाड्रन लीडर रिजवान मलिक को वीर चक्र से सम्मानित किया गया। यह सम्मान उन्हें उन चुनिंदा वायुसेना अधिकारियों की श्रेणी में स्थापित करता है जिन्होंने राष्ट्रीय महत्व के अभियानों में असाधारण वीरता का प्रदर्शन किया। वीर चक्र भारत का तीसरा सर्वोच्च युद्धकालीन वीरता पुरस्कार है, जो शत्रु की उपस्थिति में प्रदर्शित विशिष्ट साहस के लिए प्रदान किया जाता है। यह सम्मान भारतीय वायुसेना के युद्धक पायलटों की उच्च व्यावसायिक क्षमता, अनुशासन और उत्कृष्ट संचालन कौशल का प्रमाण है।

उतना ही भावपूर्ण है मरणोपरांत वीर चक्र से सम्मानित उप-निरीक्षक मोहम्मद इम्तेयाज का बलिदान। ऐसे सम्मान उन वीरों के प्रति राष्ट्र की गहन कृतज्ञता का प्रतीक हैं जिन्होंने देश की रक्षा करते हुए सर्वोच्च बलिदान दिया। यद्यपि पदक औपचारिक समारोहों में प्रदान किए जाते हैं, किंतु उनका वास्तविक महत्व उन जीवनों में निहित है जिन्हें राष्ट्र और उसके नागरिकों की सुरक्षा के लिए जोखिम में डाला गया अथवा न्योछावर कर दिया गया।

ये सभी वीरता पुरस्कार प्राप्त अधिकारी और जवान स्वतंत्रता के बाद से भारत की सेवा करने वाले उन असंख्य मुस्लिम सैनिकों, वायुयोद्धाओं, नौसैनिकों और सुरक्षा कर्मियों की गौरवशाली परंपरा का हिस्सा हैं जिन्होंने 1947, 1965, 1971 के युद्धों, कारगिल संघर्ष, ऑपरेशन सिंदूर तथा समकालीन आतंकवाद-रोधी, उग्रवाद-रोधी और आंतरिक सुरक्षा अभियानों में विशिष्ट योगदान दिया है।

उनकी सेवा इस्लाम की उन शाश्वत शिक्षाओं से भी प्रेरणा ग्रहण करती है जो साहस, न्याय और मानव जीवन की रक्षा पर बल देती हैं। यह आयत मानव जीवन की पवित्रता तथा समाज को हिंसा और अव्यवस्था से सुरक्षित रखने के दायित्व को रेखांकित करती है। जो सुरक्षा कर्मी नागरिकों की रक्षा के लिए अपने प्राणों की परवाह किए बिना कर्तव्य निभाते हैं, वे इस शिक्षा को व्यवहार में साकार करते हैं।

भारतीय रक्षा एवं सुरक्षा बलों की कार्यप्रणाली भी इन्हीं आदर्शों—कर्तव्य, ईमानदारी, अनुशासन और संविधान के प्रति अटूट निष्ठा—पर आधारित है।

बहुत कम ऐसे व्यवसाय हैं जो इस आदर्श को उतनी स्पष्टता से मूर्त रूप देते हों जितना कि वे सेवाएँ जिनमें दूसरों की सुरक्षा के लिए अपने जीवन को जोखिम में डालना पड़ता है।

भारत के रक्षा एवं सुरक्षा बल “विविधता में एकता” के सबसे सशक्त उदाहरणों में से एक हैं। विभिन्न धर्मों, भाषाओं और क्षेत्रों से आने वाले सैनिक कठिन परिस्थितियों में एक साथ कार्य करते हैं, समान उत्तरदायित्व निभाते हैं और समान जोखिम उठाते हैं। युद्धभूमि हो या आतंकवाद-रोधी अभियान, वहाँ किसी व्यक्ति की धार्मिक पहचान नहीं, बल्कि उसकी विश्वसनीयता, साहस और अपने साथियों के प्रति समर्पण ही सर्वोपरि होता है। इस वर्ष घोषित वीरता पुरस्कार एक बार फिर यह सिद्ध करते हैं कि भारत में देशभक्ति किसी एक समुदाय की धरोहर नहीं है; यह प्रत्येक उस नागरिक की पहचान है जो राष्ट्रहित को अपने व्यक्तिगत हितों से ऊपर रखता है।

जब पूरा देश अपने अलंकृत वीरों का सम्मान कर रहा है, तब इन मुस्लिम वीरता पुरस्कार प्राप्त जवानों की गाथाओं को भी व्यापक रूप से स्मरण किया जाना चाहिए। वे इसलिए महत्वपूर्ण नहीं हैं कि वे असाधारण मुस्लिम हैं, बल्कि इसलिए कि वे असाधारण भारतीय हैं। उनका साहस भारतीय गणराज्य की सुरक्षा को सुदृढ़ करता है और उनकी सेवा भारत के लोकतांत्रिक, बहुलतावादी और समावेशी चरित्र की सर्वोत्तम अभिव्यक्ति है। उनके पदक व्यक्तिगत वीरता के प्रतीक हैं, जबकि उनकी विरासत हमें यह स्मरण कराती है कि भारत की रक्षा सदैव एक सामूहिक राष्ट्रीय उत्तरदायित्व रही है और आगे भी रहेगी।

इंशा वारसी
जामिया मिल्लिया इस्लामिया

 

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *