देहरादून: पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत के जीवन के प्रेरणादायी पहलुओं पर आधारित ‘उत्तराखंडियत की ओर’ डॉक्यूमेंट्री का लोकार्पण भव्य समारोह के बीच किया गया. यह डॉक्यूमेंट्री कांग्रेस के वरिष्ठ नेता हरीश रावत के महत्वपूर्ण क्षणों का संकलन है. यह कार्यक्रम ‘आवाम इंडिया’ की ओर से आयोजित किया गया था. डॉक्यूमेंट्री के पहले पार्ट का लोकार्पण पूर्व राज्यपाल व पूर्व मुख्यमंत्री भगत सिंह कोश्यारी और यूकेडी के वरिष्ठ नेता काशी सिंह ऐरी ने बटन दबाकर किया.
कार्यक्रम के दौरान हरीश रावत ने कहा, उनके जीवन में कर्तव्य पालन के दौरान सामने आई बातें उन्होंने यथावत कही है. जिन्होंने इस डॉक्यूमेंट्री को बनाया है. उन्होंने कुछ सवाल उठाए हैं जिसके लिए वो बधाई के पात्र हैं. उन्होंने ऐसी बहुत सारी चीजें मुझसे उगलवा दी हैं, वरना यह सब चीजें मेरे साथ ही चली जातीं. डॉक्यूमेंट्री का दूसरा भाग भी बड़ा दिलचस्प है. क्योंकि उसमें उनके संघर्षों के सौपानों का गहराई से संकलन किया गया है. डॉक्यूमेंट्री के द्वितीय भाग में यह जिक्र भी किया गया है कि हमने कैसे लड़ाई लड़ने का काम किया, और उस लड़ाई को आगे बढ़ाने का काम किया.
हरीश रावत ने विशेष रूप से भगत सिंह कोश्यारी और काशी सिंह ऐरी का धन्यवाद अदा करते हुए कहा कि, उन्होंने राजनीतिक सौहार्द की एक मिसाल कायम की है. यह उत्तराखंड के इतिहास में आगे काम आने के साथ-साथ आने वाली पीढ़ियों के लिए भी बड़ा उदाहरण बनेगी.कार्यक्रम के दौरान पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने ना सिर्फ भगत सिंह कोश्यारी की जमकर तारीफ की, बल्कि उन्हें अपना दूसरा गुरु भी बताया. कहा कि, जब भगत सिंह कोश्यारी अपने संगठन को बनाने का काम कर रहे थे, उस दौरान वो ‘भगतदा’ को बड़े ध्यान से वॉच करते थे. हरीश रावत ने बड़ा बयान देते हुए कहा कि, 2002 चुनाव में भगत दा, मुख्यमंत्री होते तो स्थितियां कुछ और होती.
हरीश रावत ने कहा कि उनके जीवन यात्रा के मोड में जब वो पहली बार सांसद बने तो उस दौरान सांसद के रूप में ‘भगत दा’ किसी न किसी रूप में मदद करते थे. जब वह सांसद थे तो हर दूसरे या तीसरे महीने में वो पब्लिक मीटिंग करते थे. हालांकि, जिस स्कूल से वह पढ़े हुए हैं, वो ठीक भगत सिंह कोश्यारी के स्कूल के विपरीत था. जिसके चलते वो भगत सिंह कोश्यारी के स्कूल की आलोचना करने का काम करते थे. उस दौरान उनके पास पोस्टकार्ड की लाइन लग जाती थी. जिनकी वो आलोचना करते थे, उन पोस्टकार्ड में उन सभी का इतिहास लिखा होता था. कहा जाता था कि यह समझने का प्रयास करें कि जिसकी आप आलोचना कर रहे हैं उसके इतिहास को जानने का प्रयास करें.
हरीश रावत ने कहा कि, ऐसे भी क्षण सामने आए, जब वो चुनाव जीत रहे थे तो उनके अंदर अहंकार आया हो और लोगों ने सोचा हो कि इस अहंकार को ठीक रास्ते पर लाने का काम करना है. ऐसे में भगत सिंह कोश्यारी ने उनको ठीक रास्ता दिखाने के लिए 1991 लोकसभा चुनाव में इनके विपरीत एक व्यक्ति को लेकर आए और उसके चुनाव के संचालन का काम किया. ऐसे में उस हार के कारण उनके लाइफ में एक बड़ी चुनौती आई, जिसके आर्किटेक्ट भगत सिंह कोश्यारी थें.
हरीश रावत ने कहा कि, जब साल 2000 में उत्तराखंड राज्य बना, उसके बाद राज्य के अंदर बहुत कम राजनेता है जिन्होंने गाड, गदेरे और डांडे भी देखे. बहुत कम लोग कैसे हैं जिन्हें तराई को भी बसते देखा और भांवर को भी समझने का प्रयास किया. ऐसे में तराई- भांवर से लेकर पहाड़ को समझने वाले व्यक्तित्व में से एक व्यक्तित्व भगत सिंह कोश्यारी भी है.
हरीश रावत ने आगे कहा कि, आज जब हम देख रहे हैं कि उत्तराखंड, राज्य उत्तर प्रदेश प्रोटोटाइप के रूप में आगे बढ़ रहा है. जब हम देखते हैं कि क्यों ऐसा हो रहा है कि हम अपनी कल्पनाओं का और सोच का उत्तराखंड क्यों नहीं बन पा रहे हैं, अपने मॉडल और गवर्नेंस को क्यों नहीं डेवलप कर पा रहे हैं? तो ऐसे में उन्हें 2002 में भगत सिंह कोश्यारी के नेतृत्व में चुनावी हार की याद आ जाती है. हो सकता है कि अगर ये मुख्यमंत्री होते तो स्थितियां कुछ और होती.
वहीं कार्यक्रम के दौरान संबोधित करते हुए पूर्व मुख्यमंत्री भगत सिंह कोश्यारी ने हरीश रावत से जुड़े तमाम तथ्यों का भी जिक्र किया. भगत सिंह कोश्यारी ने कहा कि जब हरीश रावत 1981 में पहली बार सांसद बने थे, उस दौरान जब कैलाश मानसरोवर यात्रा शुरू होने वाली थी. उस दौरान उन्होंने ‘हरदा’ से कहा था कि वह भी कैलाश मानसरोवर यात्रा पर जाएं, इससे अच्छा संदेश जाएगा. जिस पर हरीश रावत ने कहा था कि वो धर्म- कर्म में कम विश्वास करते हैं. क्योंकि उस दौरान ये नए-नए थे और संजय गांधी के साथ थे, ऐसे में यह सब चलता था. लेकिन, हिंदुस्तान में कितने भी धर्म निरपेक्ष हो, भले ही बाहर धर्म न करने की घोषणा करते हैं, लेकिन अंदर से सब धर्म-कर्म करते हैं. हरीश रावत ने उनके सामने कहा कि वो धर्म कर्म में विश्वास नहीं करते हैं लेकिन दिल्ली जाकर के उन्होंने अपना वीजा बनवाया और कैलाश यात्रा करके आ गए.
भगतदा ने कहा कि, जब हरीश रावत पहली बार संसद पहुंचे, उस दौरान नए सांसद ज्यादा कुछ नहीं बोलते थे. लेकिन हरिश रावत ने प्रश्न काल में प्रश्नों की छड़ी लगा दी और जीरो काल के हीरो बन गए. जिसके चलते लोग उनके फैन बन गए. हरीश रावत ने एक-एक व्यक्ति को चिट्ठी लिखनी शुरू कर दी. जिस कारण राजनीति में मजाक करते थे कि हरीश रावत की इतनी सारी चिट्ठियां तुम्हारे पास आ गई है कि तुम उसका तकिया बना सकते हो.
अल्मोड़ा लोकसभा सीट से सांसद बनने के बाद हरीश रावत ने अल्मोड़ा के एक-एक गांव पर जाकर इस बात को साबित कर दिया कि सांसद भी गांव-गांव में जा सकता है. नैनीताल में एक हरीश ताल है, जहां पर 2014 तक कोई भी सांसद नहीं गया. ऐसे में आज जनप्रतिनिधि को भाषण देना, मंच पर जाकर बोलना, टीवी के आगे बोलना, बहुत आसान है. लेकिन जमीन पर जाकर जमीन की असलियत को समझ कर जब काम करते हैं तो उस काम में एक अलग ही सुगंध आती है. ऐसे में हरीश रावत ने अपने प्रारंभिक जीवन में वो काम किया है.

