नई दिल्ली: मिडिल ईस्ट के तनाव ने दुनिया को अपनी चपेट में ले लिया है। यह बढ़ते हुए दूसरे हफ्ते में पहुंच गया है। ऐसे में इस बात को लेकर टेंशन बढ़ गई है कि क्या भारत की एनर्जी सप्लाई काफी है। हाल ही में आई एक सरकारी रिपोर्ट के मुताबिक, देश के पास 25 करोड़ बैरल से ज्यादा क्रूड (कच्चा तेल) और पेट्रोलियम प्रोडक्ट रिजर्व में हैं। ये लगभग दो महीने की डिमांड पूरी करने के लिए काफी हैं। कम्बाइंड रिजर्व देश की एनर्जी सप्लाई चेन में सात से आठ हफ्ते तक कवरेज देता है। इसका अनुमान लगभग 4,000 करोड़ लीटर का है।
ये रिजर्व कई स्टोरेज पॉइंट पर फैले हुए हैं। इसमें मैंगलोर, पादुर और विशाखापत्तनम में मौजूद अंडरग्राउंड स्ट्रैटेजिक गुफाएं शामिल हैं। एएनआई के हवाले से एक रिपोर्ट में बताया गया है कि ज्यादा मात्रा में तेल बड़े डिस्ट्रीब्यूशन नेटवर्क के हिस्से के तौर पर जमीन के ऊपर स्टोरेज टैंक, पाइपलाइन और ऑफशोर जहाजों में रखा जाता है।
रिपोर्ट ने उन दावों को भी खारिज किया कि देश के पास सिर्फ लगभग 25 दिनों का रिजर्व है। कहा कि बड़ी सप्लाई चेन का स्टॉक देश के बफर को काफी बढ़ाता है।इसमें कच्चे तेल के इंपोर्ट के तरीके में एक बड़े बदलाव पर भी जोर दिया गया है। अब क्रूड ऑयल की खरीद 40 देशों में अलग-अलग तरह से हो रही है। वहीं, एक दशक पहले यह 27 देशों में होती थी। इस स्ट्रैटेजी को देश के हित में बताया गया है।
वैसे तो होर्मुज स्ट्रेट दुनिया के सबसे जरूरी तेल ट्रांजिट रूट में से एक है। लेकिन, रिपोर्ट में बताया गया है कि भारत का लगभग 40% क्रूड ऑयल इंपोर्ट इस पतले पानी के रास्ते से होकर गुजरता है। ज्यादातर यानी लगभग 60% दूसरे रास्तों से भारत पहुंचता है। इसमें रूस, पश्चिम अफ्रीका, अमेरिका और मध्य एशिया से सप्लाई आती है।डॉक्यूमेंट में कहा गया है कि वे दिन गए जब भारत की एनर्जी सिक्योरिटी एक ही समुद्री चोकपॉइंट की स्थितियों से बढ़ती और घटती थी। एक कॉरिडोर में कोई भी रुकावट “मैनेज्ड सोर्सिंग एडजस्टमेंट की ओर ले जाएगी। सप्लाई इमरजेंसी की ओर नहीं।
फरवरी 2026 तक रूस भारत का सबसे बड़ा क्रूड ऑयल सप्लायर बना हुआ है। रिपोर्ट में बताया गया है कि हाल के सालों में जियोपॉलिटिकल दबाव के बावजूद भारत ने G7 प्राइस कैप नियमों का पालन करते हुए खरीदारी जारी रखी है।डॉक्यूमेंट के अनुसार, भारत रूसी तेल खरीदने के लिए कभी किसी देश की इजाजत पर निर्भर नहीं रहा है। भारत फरवरी 2026 में भी रूसी तेल इंपोर्ट कर रहा था। रूस अभी भी भारत का सबसे बड़ा क्रूड ऑयल सप्लायर है।
इसमें हाल ही में अमेरिका से मिली 30-दिन की छूट का भी जिक्र है। इससे रूसी तेल की खरीद जारी रखने की इजाजत मिली है। कहा गया है कि इस कदम से एक ऐसी रुकावट दूर होती है जिसे बनाए रखना कभी किसी के हित में नहीं था। ग्लोबल एनर्जी मार्केट को स्थिर करने में भारत के योगदान को माना गया है।
घरेलू मोर्चे पर भारत के इथेनॉल ब्लेंडिंग प्रोग्राम ने भी क्रूड ऑयल के इंपोर्ट पर निर्भरता कम की है। 20% ब्लेंडिंग पहल अब हर साल लगभग 4.4 करोड़ बैरल क्रूड ऑयल की जगह लेती है।इस बीच देश की रिफाइनिंग कैपेसिटी बढ़कर 25.8 करोड़ टन प्रति वर्ष हो गई है। यह घरेलू खपत के अनुमानित 21 करोड़ और 23 करोड़ टन प्रति वर्ष के लेवल से ज्यादा है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि इस कैपेसिटी ने भारतीय रिफाइनरियों को यूरोप को फ्यूल सप्लाई करने में मदद की। यह तब हुआ जब रूसी क्रूड ऑयल पर बैन से उस मार्केट में कमी हो गई थी। इसमें कहा गया है कि भारतीय रिफाइनर किसी फिक्स्ड जगह से फिक्स्ड स्लेट पर निर्भर नहीं हैं जो इस सेक्टर की क्रूड ऑयल सोर्सिंग में फ्लेक्सिबिलिटी को दिखाता है।
कीमतें स्थिर रखने के लिए पब्लिक सेक्टर की तेल कंपनियों ने काफी फाइनेंशियल नुकसान उठाया। रिपोर्ट में कहा गया है कि इन फर्मों को पेट्रोल और डीजल पर 24,500 करोड़ रुपये और LPG पर लगभग 40,000 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ।इसका निष्कर्ष है कि सेक्टर में फैसले अफोर्डेबिलिटी, अवेलेबिलिटी और सस्टेनेबिलिटी के आधार पर लिए जाते हैं। साथ ही यह भी बताया गया है कि पिछले 12 सालों में देश में कोई भी फ्यूल पंप आउटलेट खाली नहीं हुआ है।
