जंगलों में काले हिरणों की वापसी

रायपुर। छत्तीसगढ़ के बार नवापारा अभयारण्य में काले हिरणों की सफल वापसी ने नया इतिहास रच दिया है। कभी प्रदेश के जंगलों से पूरी तरह लुप्त हो चुके काले हिरण अब यहां 200 से अधिक की संख्या में कुलांचे भरते नजर आ रहे हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने कार्यक्रम ‘मन की बात’ में इन संरक्षण प्रयासों का उल्लेख किया, जिस पर मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने इसे प्रदेश के लिए गौरवपूर्ण क्षण बताया।80 के दशक में काले हिरण केवल चिड़ियाघरों तक सीमित रह गए थे। लेकिन वर्षों की मेहनत और वैज्ञानिक प्रयासों से अब वे फिर जंगलों में प्राकृतिक जीवन जी रहे हैं। बार नवापारा में यह प्रयोग सफल होने के बाद अब राज्य के अन्य अभयारण्यों में भी इन्हें बसाने की योजना बनाई जा रही है।

एक समय ऐसा था जब प्रदेश के जंगलों से काले हिरण पूरी तरह गायब हो गए थे। 1980 के दशक के बाद इन्हें केवल चिड़ियाघरों में ही देखा जा सकता था। वन विभाग ने इन्हें वापस जंगल में बसाने का लक्ष्य तय किया। लेकिन यह आसान नहीं था। पालतू वातावरण में पले हिरणों को जंगल के खतरों, भोजन और जीवनशैली के अनुकूल बनाना बड़ी चुनौती थी। कई वर्षों की कोशिशों के बाद अब काले हिरण फिर से प्राकृतिक परिवेश में खुद को ढालने में सफल हुए हैं।

काले हिरणों को बसाने की पहली कोशिश में दिल्ली चिड़ियाघर से लाए गए हिरणों को जंगल में छोड़ा गया था। लेकिन वे जीवित नहीं रह सके और धीरे-धीरे खत्म हो गए। इसके बाद रणनीति बदली गई और बिलासपुर के कानन पेंडारी से लाए गए हिरणों को नियंत्रित तरीके से जंगल में छोड़ा गया। इस बार उन्हें बेहतर तरीके से अनुकूलन का समय और वातावरण मिला, जिससे वे जंगल में रहना सीख गए। यही कारण है कि आज उनकी संख्या 200 के पार पहुंच गई है।

बार नवापारा अभयारण्य पहले से ही गौर और तेंदुओं के लिए प्रसिद्ध रहा है। लेकिन अब यह काले हिरणों का भी प्रमुख आवास बन चुका है। यहां का प्राकृतिक वातावरण और सुरक्षा व्यवस्था हिरणों के लिए अनुकूल साबित हुई है। वन विभाग ने विशेष निगरानी और संरक्षण उपाय अपनाए, जिससे उनकी संख्या में लगातार वृद्धि हो रही है। इस सफलता के बाद अब राज्य के अन्य अभयारण्यों में भी काले हिरणों को बसाने की योजना तैयार की जा रही है।

काले हिरण केवल वन्यजीव नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक विरासत का भी हिस्सा हैं। सरगुजा से लेकर बस्तर तक के प्राचीन भित्तिचित्रों में इनका उल्लेख मिलता है, जो दर्शाता है कि ये यहां के मूल निवासी रहे हैं। वन्यप्राणी विशेषज्ञों के अनुसार इनका संरक्षण केवल जैव विविधता ही नहीं, बल्कि सांस्कृतिक पहचान को भी मजबूत करता है।

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