बीजिंग: डोनाल्ड ट्रंप ने चीन दौरे को एक बड़ी सफलता की तरफ पेश किया है। लेकिन हकीकत ये है कि बीजिंग ने उन्हें खाली हाथ और कुछ धमकियों के साथ वापस घर भेज दिया है। ट्रंप के दावे खोखले हैं और नवंबर महीने में होने वाले मध्यावधि चुनाव से पहले अपनी गिर चुकी रेटिंग को संभालने भर की एक कोशिश लगती है। हालांकि ट्रंप के दावे के मुताबिक चीन ने उन्हें गले तो नहीं लगाया लेकिन हां गर्मजोशी से स्वागत जरूर किया जो मुख्य तौर पर उनके इगो के लिए जरूरी था और शायद चीन की मंशा टकराव को बढ़ाना नहीं था। ट्रंप के लिए मिलिट्री परेड का आयोजन हुआ, तालियां बजाते स्कूली बच्चे मौजूद थे और राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने अपने प्राइवेट बगीचे का भी उन्हें सैर कराया।
चीन ने बहुत सोच समझकर इस तमाशे का आयोजन किया था जिसका मकसद ना सिर्फ खुद को अमेरिका के बराबर का सुपरपावर बताना था बल्कि अपनी श्रेष्ठता साबित करने के लिए भी तमाशे को डिजाइन किया गया था। ट्रंप उस वक्त बीजिंग पहुंचे थे जब चीन आर्थिक तौर पर महाशक्ति बन चुका है और ट्रंप सहयोगियों को अमेरिका से दूर कर चुके हैं। ट्रंप के कार्यकाल में अमेरिका ने संधियों और अंतर्राष्ट्रीय संस्थानों से खुद को अलग कर लिया है, यूरोप और अफगानिस्तान में अपनी रणनीतिक जगह गंवा दी है और ईरान के साथ एक ऐसे विनाशकारी युद्ध में उलझ गया है, जिससे बाहर निकलने के लिए वो छटपटा रहा है।
इस मुलाकात में चीन का पलड़ा भारी लग रहा था। द संडे गार्डियन की रिपोर्ट में जियो पॉलिटिकल एक्सपर्ट अजय सिंह ने लिखा है कि चीन के सामने ट्रंप का टैरिफ युद्ध का दांव उल्टा पड़ चुका है। अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट भी उसे खारिज कर चुका है। जबकि चीन ने अमेरिका को रेयर अर्थ की सप्लाई रोक दी जिससे ट्रंप चार कदम पीछे हटने को मजबूर हो गये। इस मुलाकात के दौरान दोनों पक्षों की प्राथमिकताएं अलग अलग थीं। जैसे अमेरिका के लिए तीन ‘B’। बोइंग, बीफ और बीन्स। ट्रंप ने दावा किया कि चीन अमेरिका से 200 बोइंग विमान और “अरबों डॉलर” का बीफ और सोयाबीन खरीदने पर सहमत हो गया है। लेकिन चीन ने बहुत प्यार से ट्रंप के दावों को खारिज कर दिया। यहां तक कि CEO और बिजनेस लीडर्स का जो बड़ा दल ट्रंप के साथ गया था उसे भी खाली हाथ ही लौटना पड़ा। चीन ने बस एक ही रियायत दी वह थी सितंबर में किसी समय शी जिनपिंग के वॉशिंगटन के जवाबी दौरे पर सहमति देना।
जियो पॉलिटिकल एक्सपर्ट अजय सिंह के मुताबिक चीन के लिए वो 3 ‘T’ थे ताइवान, टैरिफ और टेक्नोलॉजी। ताइवान पर शी जिनपिंग ने ट्रंप को युद्ध की चेतावनी दी। जिसपर ट्रंप शी जिनपिंग के सामने नतमस्तक दिखे। जैसे उन्होंने कहा कि वो ताइवान की स्वतंत्रता का समर्थन नहीं करते हैं और उन्होंने ये भी बताया कि 11 अरब डॉलर की हथियारों की सप्लाई में देरी कर दी गई है। ईरान युद्ध से अमेरिका कमजोर हुआ है और ये चीन जानता है। चीनी दृष्टिकोण से जो बात उभरकर सामने आई वह यह थी कि वह “अमेरिका के साथ अपने संबंधों में स्थिरता चाहता है” बशर्ते कि इससे चीन के हितों पर कोई आंच न आए। शायद ‘G2’ समूह के एक हिस्से के तौर पर।
चीन फिलहाल के लिए अमेरिका के साथ G2 बनाना चाहता है यानि दुनिया पर बराबर बराबर का अधिकार। लेकिन चीन के भविष्य का मकसद पूरी दुनिया पर वर्चस्व कायम करना है लेकिन तब तक उसे शांति चाहिए। चीन का दीर्घकालिक लक्ष्य सबसे बड़ी शक्ति बनना ही है। दुनिया की अग्रणी शक्ति के रूप में अपनी जगह बनाना उसका मकसद है चाहे अमेरिका के साथ मिलकर या उसके मुकाबले में। अमेरिका ने दुनिया भर में जो रणनीतिक जगह खाली की है चीन धीरे-धीरे उस पर कब्जा करता जा रहा है। अमेरिका ने UN, WTO, GATT, NATO जैसी उन संस्थाओं से भी मुंह मोड़ लिया है जिन्होंने दशकों तक विश्व व्यवस्था को बनाए रखा था और चीन इस उथल-पुथल का फायदा उठा रहा है।
अमेरिका ने जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वार्मिंग जैसे वैश्विक चिंता के मुद्दों को भी नजरअंदाज कर दिया है। ये ऐसे क्षेत्र हैं जहां चीन एक बड़ी नेतृत्वकारी भूमिका चाहता है और वह इसे हासिल भी कर सकता है। अभी के लिए वह “अमेरिका के साथ अपने संबंधों में स्थिरता चाहता है।” लेकिन जैसे-जैसे अमेरिका और चीन वैश्विक प्रभाव के लिए होड़ करेंगे यह रिश्ता प्रतिस्पर्धियों, विरोधियों या साझेदारों में से कैसा होगा यही इस सदी की वैश्विक व्यवस्था तय कर सकता है।

