अमेरिका ने वर्षों तक भारत पर लगाया दांव

बीजिंग: वैश्विक मंचों पर अक्सर खिलाफ दिखने वाले चीन और अमेरिका के नेता जमकर एक-दूसरे की तारीफ कर रहे हैं। डोनाल्ड ट्रंप फिलहाल चीन में हैं और दोनों तरफ से संबंधों की बेहतरी पर बात की गई है। इस दौरे पर जिन देशों की खासतौर से नजर लगी है, उनमें भारत का नाम सबसे प्रमुख है। इसकी वजह ये है कि अमेरिका ने हलिया वर्षों में चीन को अपने सबसे प्रमुख प्रतिद्वंद्वी की तरह देखा है और भारत को बीजिंग को संतुलित करने के लिए आगे बढ़ाने की कोशिश की है लेकिन अब से स्थिति बदल सकती है। यह स्थिति भारत के लिए एक इम्तिहान की तरह हो सकती है।

सीएनबीसी इनसाइड इंडिया की रिपोर्ट कहती है कि बीते दो दशको से अमेरिका ने भारत को इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में चीन के बढ़ते प्रभाव के मुकाबले के लिए एक संतुलन बनाने वाले देश के तौर पर देखा है। हालांकि मौजूदा ट्रंप प्रशासन का रवैया बीजिंग के पक्ष में और भारत को नुकसान पहुंचाने जैसा है। ऐसे में अमेरिका-चीन शिखर सम्मेलन की खासतौर से नई दिल्ली के लिए अहमियत है।

भारत की डोनाल्ड ट्रंप और शी जिनपिंग की बैठक पर पैनी नजर है क्योंकि दोनों के टकराव और दोस्ती का असर दिल्ली पर होता रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि इस शिखर सम्मेलन से चीन के प्रति ट्रंप का नरम रुख किसी ऐसे सौदे का कारण बनता है तो इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में नई दिल्ली की भूमिका कमजोर पड़ सकती है।हूवर इंस्टीट्यूशन में विजिटिंग फेलो रोनक डी देसाई ने सीएनबीसी को बताया कि ट्रंप बीजिंग के साथ कोई बड़ा द्विपक्षीय सौदा करता है तो भारत की फिक्र बढ़ेगी। भारत की चिंता होगी कि चीन को अमेरिका एशिया में केंद्रीय रणनीतिक चुनौती के बजाय वार्ताकार साझेदार के तौर पर देख सकता है। भारत नहीं चाहेगा कि अमेरिका क्षेत्र में उसकी रणनीतिक अहमियत को नजरअंदाज करे।

ट्रंप और शी की आखिरी मुलाकात नवंबर में दक्षिण कोरिया के बुसान में हुई थी। अमेरिकी राष्ट्रपति ने उस वक्त शी को एक कड़ा वार्ताकार बताया था। ऐसा लगता है कि जिनपिंग को ट्रंप पसंद कर रहे हैं। हाल के दिनों में ये साफ देखा गया है कि शी के प्रति ट्रंप का रुख काफी नरम रहा है।चैथम हाउस में दक्षिण एशिया के लिए वरिष्ठ रिसर्च फेलो चीतिज बाजपेयी कहते हैं, ‘ट्रंप प्रशासन के तहत चीन के मुकाबले भारत को एक संतुलनकारी शक्ति के रूप में देखने का नजरिया कमजोर पड़ा है। ट्रंप की विदेश नीति दूसरे कार्यकाल के दौरान ज्यादा लेन-देन आधारित रही है और मूल्यों पर उनका जोर नहीं है।’

CSIS में भारत और उभरती एशियाई अर्थव्यवस्थाओं पर एसोसिएट फेलो आर्यन डीरोजोरियो के मुताबिक ट्रंप के दूसरे प्रशासन की शुरुआत चीन के मामले में सख्त रवैये के साथ हुई थी लेकिन जब उन्हें एहसास हुई कि अमेरिकी कंपनियों के लिए जरूरी चीनी पुर्जों का विकल्प उनके पास नहीं है तो उनके रवैये में नरमी आई।भारत के संबंध इस समय चीन और अमेरिका दोनों से ही बहुत मधुर नहीं हैं। नई दिल्ली के नजरिए से ट्रंप-शी मुलाकात को कुछ आशंका के साथ देखेगा क्योंकि उसे G2 अवधारणा के फिर से उभरने की चिंता है। एक ऐसी अवधारणा जो भारत जैसी ताकतों को हाशिए पर धकेल सकती है।

चीतिज बाजपेयी कहते हैं कि एक तरफ ट्रंप की लेन-देन आधारित विदेश नीति के चलते अमेरिका-भारत संबंधों में खटास आई। वहीं दूसरी ओर बीजिंग और नई दिल्ली के दशकों पुराने सीमा विवादों हैं और उनके संबंध तनावपूर्ण रहे हैं। ऐसे माहौल में भारत बाकी एशियाई देशों के मुकाबले अमेरिका-चीन शिखर सम्मेलन के नतीजों पर ज्यादा बारीकी से नजर रखेगा।

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