बारात लेकर दूल्हों के घर पहुंचीं दुल्हनें

विकासनगर: देहरादून जिले के जौनसार बावर में भी विवाह की एक अनूठी परंपरा है.जौनसार बावर में संयुक्त परिवार को बढ़ावा देने और विवाह में फिजूलखर्ची रोकने के लिए सामूहिक विवाह की अनूठी परंपरा है. इसके तहत एक ही परिवार के विवाह योग्य कई भाइयों की शादियां एक साथ होती हैं. जब कई दुल्हनें एक साथ बारात लेकर अपने ससुराल पहुंचती हैं, तो वो दृश्य अविस्मरणीय होता है. ऐसा ही नजारा जौनसार के खारसी गांव में दिखा. यहां एक ही परिवार में पांच दुल्हनों की बारात पहुंची. इस दौरान दूल्हा पक्ष के घर से एक बेटी अपने ससुराल बारात लेकर विदा हुई.

उत्तराखंड के जिला देहरादून स्थित जौनसार बावर जनजातीय क्षेत्र अपनी समृद्ध पंरपराओं और सांस्कृतिक विरासत को संजोए हुए है. इन दिनों जहां शादी विवाह जैसे आयोजनों में लोग बहुत अधिक खर्च कर रहे हैं, ऐसे में जौनसार बावर के एक गांव ने मिसाल कायम की है. खारसी गांव निवासी परिवार के मुखिया दौलत सिंह चौहान के घर में 29 अप्रैल के दिन खुशियों का माहौल देखने को मिला.दौलत सिंह के पुत्र नरेंद्र सिंह, मोहन सिंह के पुत्र प्रीतम सिंह, अमित सिंह, प्रदीप सिंह और स्वर्गीय बारू सिंह के पुत्र राहुल सिंह और बेटी राधिका (प्रियंका) की शादी (जोजोड़ा) (Jojoda) की रस्म निभाई गई. इसमें एक साथ पांच दुल्हनें बारात लेकर अपने ससुराल खारसी गांव पहुंचीं. बारातियों का वाद्य यंत्रों की थाप के साथ फूल मालाएं पहनाकर स्वागत किया गया.

देहरादून की पूर्व जिला पंचायत अध्यक्ष मधु चौहान ने बताया कि-ओमकार बाबा की थाती खारसी गांव प्राकृतिक रूप से बहुत सुंदर है. कई बार मुझे यहां पर आने का मौका मिला है. आज इस अनोखे विवाह समारोह में शामिल होने आई हूं. मैं दोलत सिंह जी के पूरे ही परिवार को बहुत-बहुत बधाई देती हूं जो उनके घर पांच बहुएं आई हैं. जो बेटी इनके घर से विदा हो रही है, उसको भी शुभकामनाएं देती हूं.

मधु चौहान ने कहा कि यह एक सामूहिक परिवार की समृद्ध परंपरा है. जौनसार बावर एकता की मिसाल है. यहां परिवारों में जो आपस मेलजोल है, वह अविस्मरणीय है. मैं चाहती हूं कि बाकी देश दुनिया को भी इसके बारे में जानकारी होनी चाहिए. इसका उद्देश्य था कि जो लड़की का परिवार है, उनके ऊपर शादी के खर्च का भार कम से कम पड़े.कुल पुरोहित भीम दत्त ने बताया कि जिस परिवार में शादी है, उनके परिवार का नाम किमाण परिवार है. उनके घर में पहले से ही बहुत जानकार और बुद्धिमान लोग रहते आए हैं. इनमें स्वर्गीय बर्फिया सरपंच, दौलत सिंह के पिताजी थे.

विवाह में आमतौर पर दूल्हा बारात लेकर दुल्हन के घर जाता है और विवाह की रस्में पूरी करके दुल्हन को विदा कराकर लाता है. जौनसार बावर में दुल्हनें बारात लेकर दूल्हे के घर जाती हैं. विवाह की रस्में पूरी होने के बाद अगले दिन उसके साथ गए 15-20 बाराती वापस लौट जाते हैं. दो दिन बात दुल्हन अपने दूल्हे के साथ मायके जाती है. विवाह की इस परंपरा को जौनसार बावर में जोजोड़ा कहते हैं.

आमतौर पर हिंदुओं के विवाह में सात फेरे होते हैं. जोजोड़ा विवाह की खास बात यह है कि इसमें फेरे नहीं होते हैं. पंडित कुल पुरोहित द्वारा मंत्रोच्चार पूजा के समय में दूल्हा दूल्हन को वचन पूरे किए जाते हैं. वरमाला के बाद दूल्हे की बहन द्वारा दूल्हा दुल्हन के पैरों को धोने की रस्म भी की जाती है. उसके बाद घर के मुख्य द्वार पर दूल्हे की मां के द्वारा वर वधू को तिलक, धूप देकर आशीर्वाद दिया जाता.

जौनसार बावर उत्तराखंड के देहरादून जिले में आता है. ये एक पर्वतीय इलाका है. चकराता तहसील का ये हिस्सा जनजातीय प्रमुख इलाका है. ये क्षेत्र अपनी ऐतिहासिक विरासत, अनूठी संस्कृति और जीवंत परंपराओं के लिए जाना जाता है. यहां के लोग सनातन धर्म के अनुयायी हैं और हनोल स्थित ‘महासू देवता’ इनके अराध्य देव हैं. यहां के लोगों का मुख्य व्यवसाय कृषि और पशुपालन है. यहां फल भी उगाए जाते हैं. ये पहाड़ी क्षेत्र टोंस और यमुना नदियों के बीच स्थित है.

जौनसार बावर के लोग खुद को पांडवों का वंशज मानते हैं. यहां लाखामंडल क्षेत्र है. लाखामंडल को महाभारत काल में पांडवों के अज्ञातवास से जोड़ा जाता है. ऐसी मान्यता है कि अज्ञातवास में पांडवों ने यहीं समय बिताया था. लाखामंडल यानी लाक्षागृह का वर्णन महाभारत में है. इस लाखामंडल को कौरवों द्वारा पांडवों को जलाकर मारने के लिए बनाए लाक्षागृह से जोड़ा जाता है. अब इसके अवशेष बचे हैं.

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